चाणक्य का नाम आज भी राजनीति, प्रबंधन, कूटनीति और नेतृत्व का पर्याय माना जाता है।
प्रस्तावना : प्रथम भाग में आपने आचार्य चाणक्य के जन्म, बाल्यकाल, शिक्षा, तक्षशिला में उनके आचार्य बनने, धनानंद द्वारा अपमानित किए जाने तथा चन्द्रगुप्त मौर्य से उनकी प्रथम भेंट के विषय में पढ़ा। अब इस द्वितीय भाग में वर्णन होगा कि किस प्रकार आचार्य चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को शिक्षित किया, उसे एक महान योद्धा और राजा बनाया, सेना संगठित की, गुप्त योजनाएँ बनाईं तथा नन्द वंश के विरुद्ध अपने महान अभियान का प्रारम्भ किया।
जब आचार्य चाणक्य ने बालक चन्द्रगुप्त को खेलते हुए देखा, तब वे उसकी न्यायप्रियता, नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति से अत्यन्त प्रभावित हुए। उन्होंने उसी समय निश्चय कर लिया कि यही बालक भविष्य में एक महान सम्राट बनेगा।
कहा जाता है कि चाणक्य ने उसके पालक अथवा संरक्षक से उसे अपने साथ ले जाने की अनुमति प्राप्त की और उसे अपने संरक्षण में लेकर तक्षशिला ले गए। वहाँ उन्होंने चन्द्रगुप्त को केवल सामान्य शिक्षा ही नहीं, बल्कि राजधर्म, राजनीति, युद्धनीति, शस्त्र संचालन, कूटनीति और प्रशासन की विशेष शिक्षा देना प्रारम्भ किया।
आचार्य चाणक्य मानते थे कि केवल जन्म से कोई राजा नहीं बनता, बल्कि कठोर अनुशासन, ज्ञान, तपस्या और प्रशिक्षण से राजा बनता है। इसलिए उन्होंने चन्द्रगुप्त को अत्यन्त कठिन प्रशिक्षण दिया।
प्रतिदिन प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक उसका अभ्यास चलता था। उसे निम्न विषयों का ज्ञान दिया गया :
• तलवारबाजी
• धनुर्विद्या
• गदा युद्ध
• भाला संचालन
• घुड़सवारी
• हाथी संचालन
• युद्ध रणनीति
• सेना संचालन
• गुप्तचर तंत्र
• शत्रु मनोविज्ञान
• कूटनीति
• जनसंपर्क
• राज्य संचालन
चाणक्य कहते थे :
“राजा बनने के लिए पहले स्वयं को जीतना पड़ता है, तभी संसार जीता जा सकता है।”
चाणक्य अत्यन्त अनुशासनप्रिय थे। वे चन्द्रगुप्त को सिखाते थे कि जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह कभी राज्य नहीं चला सकता।
वे उसे भूखा रखकर, कम सुलाकर, कठिन परिस्थितियों में डालकर मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाते थे।
उनका विश्वास था :
“आराम मनुष्य को कमजोर बनाता है, संघर्ष उसे महान बनाता है।”
कथा प्रचलित है कि चाणक्य ने भविष्य में षड्यंत्रों से बचाने के लिए चन्द्रगुप्त को प्रतिदिन अल्प मात्रा में विष देना प्रारम्भ किया ताकि उसका शरीर विष के प्रति सहनशील बन जाए।
यह कार्य वे गुप्त रूप से करते थे जिससे यदि कोई शत्रु उसे विष देकर मारना चाहे तो वह बच सके।
यह कथा लोकप्रिय परम्परा में मिलती है और चाणक्य की दूरदर्शिता का उदाहरण मानी जाती है।
चाणक्य जानते थे कि धनानंद का साम्राज्य अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली है। उसकी सेना विशाल थी, धन अपार था और मगध की राजधानी पाटलिपुत्र अभेद्य मानी जाती थी।
इसलिए उन्होंने बिना तैयारी के युद्ध करने के स्थान पर पहले वर्षों तक नन्द वंश की शक्ति, कमजोरी, गुप्त मार्ग, सेनापति, मंत्री, प्रजा की भावना और आन्तरिक षड्यंत्रों का अध्ययन किया।
वे कहते थे :
“युद्ध तलवार से नहीं, बुद्धि से जीता जाता है।”
कुछ कथाओं के अनुसार प्रारम्भ में चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने बिना पर्याप्त तैयारी के नन्दों के विरुद्ध आक्रमण किया, किन्तु उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
यह पराजय उनके लिए बड़ा सबक सिद्ध हुई।
चाणक्य ने कहा :
“असफलता यह नहीं बताती कि तुम हार गए; वह बताती है कि अभी तैयारी अधूरी है।”
कहा जाता है कि एक दिन पराजय के बाद चाणक्य और चन्द्रगुप्त एक गाँव में ठहरे हुए थे। वहाँ एक माता अपने बालक को डाँट रही थी क्योंकि वह खिचड़ी को बीच से खाने लगा और उसका मुँह जल गया।
माता बोली :
“मूर्ख! खिचड़ी हमेशा किनारों से खाई जाती है, बीच से नहीं।”
यह सुनकर चाणक्य समझ गए कि उन्होंने भी यही गलती की है—सीधे मगध के केन्द्र पर आक्रमण कर दिया जबकि पहले सीमावर्ती राज्यों को जीतना चाहिए था।
उन्होंने इस शिक्षा को अपनाया और अपनी रणनीति बदल दी।
अब चाणक्य ने निर्णय लिया कि पहले मगध के आसपास के छोटे राज्यों को अपने अधीन किया जाए, सेना मजबूत की जाए, संसाधन जुटाए जाएँ और धीरे-धीरे नन्द साम्राज्य को चारों ओर से घेरा जाए।
यह योजना अत्यन्त सफल सिद्ध हुई।
चाणक्य ने विभिन्न जनजातियों, योद्धाओं, असंतुष्ट सैनिकों, सीमावर्ती राज्यों और युवाओं को एकत्र कर सेना बनानी शुरू की।
उन्होंने केवल बलवान ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान और निष्ठावान सैनिकों का चयन किया।
वे कहते थे :
“छोटी किन्तु निष्ठावान सेना, विशाल परन्तु स्वार्थी सेना से श्रेष्ठ होती है।”
चाणक्य ने भारत का अत्यन्त शक्तिशाली गुप्तचर तंत्र स्थापित किया। उनके जासूस हर नगर, हर राज्य, हर राजदरबार और हर बाजार में फैले हुए थे।
वे साधु, व्यापारी, नर्तक, सेवक, सैनिक और आम नागरिक बनकर सूचनाएँ एकत्र करते थे।
चाणक्य का मानना था :
“राजा की आँखें उसके गुप्तचर होते हैं।”
उन्होंने अपने शिष्यों को सिखाया :
“यदि शत्रु तुमसे अधिक शक्तिशाली हो तो सामने से युद्ध मत करो; उसकी शक्ति को भीतर से तोड़ो।”
इसलिए उन्होंने नन्द साम्राज्य के भीतर विद्रोह, भ्रम, असंतोष और गुटबाज़ी फैलानी प्रारम्भ की।
धनानंद की प्रजा उससे असन्तुष्ट थी क्योंकि वह कर अधिक लेता था और अहंकारी था। चाणक्य ने इस असन्तोष को अपने पक्ष में उपयोग किया।
उन्होंने जनता में यह भावना फैलायी कि नया शासन अधिक न्यायपूर्ण होगा।
चाणक्य ने पड़ोसी राजाओं से भी सम्बन्ध बनाए। कुछ को मित्र बनाया, कुछ से संधि की, और कुछ को कूटनीति से अपने पक्ष में कर लिया।
उनका सिद्धान्त था :
“शत्रु का शत्रु, मित्र होता है।”
1. अवसर की प्रतीक्षा मत करो, अवसर स्वयं बनाओ।
2. जिस कार्य से डर लगता हो, उसे पहले करो।
3. अपने लक्ष्य पर ध्यान रखो, बाधाओं पर नहीं।
4. मित्रता बराबरी वालों से करो।
5. अत्यधिक मोह विनाश का कारण बनता है।
6. मूर्ख को उपदेश देना स्वयं को कष्ट देना है।
7. क्रोध निर्णय शक्ति नष्ट कर देता है।
8. धन की रक्षा संकट के लिए करो।
9. जो जागरूक रहता है वही सुरक्षित रहता है।
10. शत्रु को कभी कमजोर मत समझो।
चाणक्य केवल युद्धकला ही नहीं सिखाते थे, बल्कि चन्द्रगुप्त के भीतर आत्मविश्वास भी भरते थे। वे कहते थे :
“जो स्वयं को जीत लेता है, उसे संसार नहीं हरा सकता।”
धीरे-धीरे चन्द्रगुप्त एक सामान्य बालक से वीर, बुद्धिमान और आत्मविश्वासी सेनानायक बन गया।
यह था चाणक्य महाग्रंथ का द्वितीय भाग जिसमें वर्णित हुआ कि किस प्रकार चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को शिक्षित किया, अनुशासन दिया, सेना बनाई, गुप्तचर तंत्र स्थापित किया और नन्द वंश को हराने की तैयारी की।
अगले भाग में : नन्द वंश के साथ निर्णायक युद्ध, धनानंद का पतन, चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक, चाणक्य की महान रणनीतियाँ, और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की सम्पूर्ण कथा।