चाणक्य का नाम आज भी राजनीति, प्रबंधन, कूटनीति और नेतृत्व का पर्याय माना जाता है।
प्रस्तावना : पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार आचार्य चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को शिक्षित किया, उसे युद्धकला, राजनीति और कूटनीति में निपुण बनाया, सेना संगठित की तथा नन्द वंश के विरुद्ध अपनी महान योजना तैयार की। अब इस तृतीय भाग में वर्णन होगा नन्द साम्राज्य पर आक्रमण, धनानंद के पतन, मौर्य साम्राज्य की स्थापना और चाणक्य की महान रणनीतियों का।
वर्षों की तैयारी के बाद चाणक्य ने अनुभव किया कि अब समय आ गया है जब नन्द वंश को चुनौती दी जा सकती है। चन्द्रगुप्त की सेना अब पहले से अधिक शक्तिशाली, प्रशिक्षित और अनुशासित हो चुकी थी।
उनकी सेना में अनेक प्रकार के सैनिक सम्मिलित थे :
• पैदल सेना
• घुड़सवार सेना
• रथ सेना
• हाथी सेना
• गुप्तचर सैनिक
चाणक्य ने हर सैनिक को स्पष्ट आदेश दिया कि युद्ध केवल भूमि जीतने के लिए नहीं, बल्कि अन्याय समाप्त करने के लिए है।
चाणक्य ने अपनी पूर्व योजना के अनुसार सीधे पाटलिपुत्र पर आक्रमण न करके पहले मगध के सीमावर्ती क्षेत्रों पर अधिकार करना प्रारम्भ किया। एक-एक करके छोटे किलों, नगरों और सीमांत चौकियों को जीत लिया गया।
इस रणनीति से नन्द साम्राज्य की बाहरी सुरक्षा कमजोर होने लगी।
चाणक्य कहते थे :
“जो वृक्ष काटना हो, पहले उसकी जड़ों को निर्बल करो।”
चाणक्य ने केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध भी किया। उन्होंने अपने गुप्तचरों द्वारा नन्द सेना में भ्रम फैलाया कि राजा धनानंद अपने सैनिकों पर विश्वास नहीं करता।
कुछ स्थानों पर यह अफवाह फैलाई गई कि सेनापति राजा के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं।
इससे नन्द सेना के भीतर अविश्वास फैल गया और उनकी एकता कमजोर होने लगी।
जब पर्याप्त क्षेत्र जीत लिया गया और नन्द सेना का मनोबल टूट गया, तब चाणक्य ने पाटलिपुत्र को चारों ओर से घेरने का आदेश दिया।
मगध की राजधानी अत्यन्त विशाल और सुरक्षित थी, किन्तु चाणक्य ने महीनों तक उसकी नाकेबंदी की। उन्होंने सभी व्यापार मार्ग बंद करवा दिए, भोजन आपूर्ति रोक दी और सहायता मार्ग नष्ट कर दिए।
उनका सिद्धान्त था :
“यदि शत्रु को भूखा कर दो, तो आधा युद्ध बिना लड़े जीत लिया जाता है।”
अन्ततः वह दिन आया जब चन्द्रगुप्त की सेना और धनानंद की विशाल सेना के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।
धनानंद के पास संख्या अधिक थी, किन्तु चन्द्रगुप्त की सेना अधिक प्रशिक्षित और प्रेरित थी।
युद्ध कई दिनों तक चला। चन्द्रगुप्त ने अद्भुत वीरता दिखाई और स्वयं अग्रिम पंक्ति में युद्ध किया।
चाणक्य पीछे से सम्पूर्ण युद्ध संचालन कर रहे थे।
अन्ततः धनानंद पराजित हुआ। विभिन्न कथाओं में उसके अंत के अलग-अलग वर्णन मिलते हैं—कुछ कथाओं में वह मारा गया, कुछ में उसे निर्वासित किया गया।
किन्तु इतना निश्चित है कि नन्द वंश का पतन हुआ और चाणक्य की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई।
तब चाणक्य ने वर्षों बाद अपनी शिखा पुनः बाँधी और कहा :
“आज मेरा संकल्प पूर्ण हुआ।”
धनानंद की पराजय के पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य का भव्य राज्याभिषेक किया गया। समस्त प्रजा ने उसे अपने नए सम्राट के रूप में स्वीकार किया।
इस प्रकार भारत के इतिहास में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई।
चाणक्य उसके महामंत्री बने और सम्पूर्ण प्रशासन अपने निर्देशन में संगठित किया।
चाणक्य ने कहा :
“राजा का सुख प्रजा के सुख में है, राजा का हित प्रजा के हित में है।”
उन्होंने चन्द्रगुप्त को सिखाया कि राजा का जीवन निजी सुख के लिए नहीं, बल्कि प्रजा सेवा के लिए होता है।
चाणक्य ने साम्राज्य को अनेक विभागों में बाँटा :
• रक्षा विभाग
• वित्त विभाग
• कृषि विभाग
• व्यापार विभाग
• न्याय विभाग
• गुप्तचर विभाग
हर विभाग के लिए अलग अधिकारी नियुक्त किए गए।
चाणक्य ने संतुलित कर व्यवस्था बनाई। उनका मानना था :
“राजा को प्रजा से कर उसी प्रकार लेना चाहिए जैसे मधुमक्खी फूल से मधु लेती है—बिना उसे क्षति पहुँचाए।”
अर्थात कर इतना हो कि राज्य चले, पर प्रजा पर अत्याचार न हो।
मौर्य साम्राज्य में चाणक्य ने अत्यन्त विशाल गुप्तचर तंत्र स्थापित किया। उनके जासूस केवल शत्रुओं पर नहीं, बल्कि मंत्रियों, अधिकारियों और सेनापतियों पर भी दृष्टि रखते थे।
उनका विश्वास था :
“विश्वास करो, परन्तु जाँच करके।”
चाणक्य अत्यन्त कठोर प्रशासक थे। यदि कोई अधिकारी भ्रष्टाचार करता, जनता को कष्ट देता या राज्य से विश्वासघात करता, तो उसे तुरंत दण्ड दिया जाता।
वे कहते थे :
“जहाँ दण्ड नहीं होता, वहाँ व्यवस्था नष्ट हो जाती है।”
एक बार विदेशी दूत चाणक्य से मिलने आए। उस समय वे राजकार्य कर रहे थे और एक दीपक जल रहा था। जब राजकार्य समाप्त हुआ, उन्होंने वह दीपक बुझा दिया और दूसरा दीपक जला लिया।
दूत ने पूछा – “ऐसा क्यों?”
चाणक्य ने उत्तर दिया :
“पहला दीपक राज्य के धन से जल रहा था और मैं उससे राजकार्य कर रहा था। अब मैं व्यक्तिगत वार्ता कर रहा हूँ, इसलिए निजी दीपक जलाया है।”
यह उनकी ईमानदारी और नीति का महान उदाहरण है।
1. व्यक्ति अपने कर्मों से महान बनता है, जन्म से नहीं।
2. शिक्षा सबसे बड़ा धन है, इसे कोई चुरा नहीं सकता।
3. कठिन समय में धैर्य सबसे बड़ा अस्त्र है।
4. बिना सोचे कार्य करना विनाश को बुलाना है।
5. शत्रु को कभी कम मत आँको।
6. धन, मित्र और शक्ति – तीनों का संतुलन आवश्यक है।
7. सफलता उन्हीं को मिलती है जो हार नहीं मानते।
8. राजा को सदैव जागरूक रहना चाहिए।
9. जो समय को पहचानता है वही सफल होता है।
10. बुद्धिमान व्यक्ति अवसर स्वयं बना लेता है।
चन्द्रगुप्त केवल चाणक्य का शिष्य नहीं था; वह उन्हें पिता तुल्य मानता था। वह हर निर्णय से पूर्व उनसे परामर्श करता था।
चाणक्य ने उसे केवल सिंहासन नहीं दिया, बल्कि उसे एक आदर्श सम्राट बनाया।
यह था चाणक्य महाग्रंथ का तृतीय भाग जिसमें आपने पढ़ा कि किस प्रकार नन्द वंश का पतन हुआ, मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई और चन्द्रगुप्त सम्राट बना।
अगले भाग में : सिकन्दर के उत्तराधिकारियों से युद्ध, अखण्ड भारत का विस्तार, चाणक्य का अर्थशास्त्र, उनकी गुप्त राजनीतिक नीतियाँ और राज्य संचालन के रहस्य।