संभाजी महाराज को महाराष्ट्र में प्यार से 'छावा' (शेर का शावक) कहा जाता है।
संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले में हुआ था। जब वे मात्र दो वर्ष के थे, तब उनकी माता सईबाई का निधन हो गया। इसके बाद उनका लालन-पालन उनकी दादी राजमाता जीजाबाई की देखरेख में हुआ, जिन्होंने उनके भीतर कूटनीति, धर्म और स्वराज्य के बीज बोए
संभाजी महाराज केवल तलवार के ही धनी नहीं थे, बल्कि उनकी कलम भी उतनी ही तेज थी। उन्होंने मात्र 14 वर्ष की आयु में संस्कृत में 'बुधभूषणम्' नामक एक उत्कृष्ट ग्रंथ लिखा, जो राजनीति और राज्य-प्रशासन पर आधारित है। इसके अलावा उन्होंने ब्रज भाषा और हिंदी में 'नायिकाभेद', 'नखशिख' और 'सातसतक' जैसे ग्रंथ भी लिखे। उन्हें मराठी, संस्कृत, हिंदी, फारसी, पुर्तगाली और अंग्रेजी सहित लगभग 13 से अधिक भाषाओं का ज्ञान था, जो उन्हें विदेशी शत्रुओं से कूटनीतिक बातचीत में बहुत मदद करता था।
जब संभाजी मात्र 9 वर्ष के थे, तब उन्हें अपने पिता शिवाजी महाराज के साथ औरंगजेब के आगरा दरबार में जाना पड़ा था। जब औरंगजेब ने शिवाजी महाराज का अपमान किया और उन्हें बंदी बना लिया, तब भी नन्हे संभाजी जरा भी नहीं घबराए। जब शिवाजी महाराज ने मुगलों की कैद से भागने की ऐतिहासिक योजना (मिठाई की टोकरियों में छिपकर) बनाई, तो इस योजना की सफलता में 9 साल के संभाजी की सूझबूझ और धैर्य का बहुत बड़ा हाथ था। इतनी कम उम्र में उन्होंने मुगलों की राजधानी से महाराष्ट्र तक की लंबी और खतरनाक यात्रा वेश बदलकर पूरी की थी।
3 अप्रैल 1680 को छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद स्वराज्य पर संकट के बादल मंडराने लगे। दरबार में कुछ मंत्रियों (अष्टप्रधान मंडल के कुछ सदस्यों) ने संभाजी के खिलाफ षड्यंत्र रचे, लेकिन अपनी बुद्धिमत्ता और सेना के समर्थन से उन्होंने सभी आंतरिक विद्रोहों को शांत किया और 16 जनवरी 1681 को उनका विधिवत राज्याभिषेक हुआ।
संभाजी महाराज ने अपने 9 वर्ष के छोटे से शासनकाल में लगभग 121 (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 120) युद्ध लड़े और सबसे बड़ी बात यह है कि वे एक भी युद्ध नहीं हारे। उन्होंने एक ही समय में चार अलग-अलग मोर्चों पर दुश्मनों को धूल चटाई
1: उत्तर से औरंगजेब की विशाल मुगल सेना। 2: पश्चिम में जंजीरा के सिद्दी। 3: तटीय क्षेत्रों में पुर्तगाली। 4: चालबाज अंग्रेज।
पुर्तगाली स्वराज्य की जनता पर अत्याचार कर रहे थे और जबरन धर्मांतरण करवा रहे थे। संभाजी महाराज ने 1683 में पुर्तगालियों के खिलाफ एक भयंकर अभियान छेड़ा। वे अपनी सेना के साथ इतनी तेजी से आगे बढ़े कि पुर्तगाली वायसरॉय को अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटना पड़ा। संभाजी गोवा पर पूरी तरह कब्जा करने ही वाले थे कि तभी औरंगजेब की एक विशाल सेना ने मराठा साम्राज्य के दूसरे हिस्से पर हमला कर दिया, जिसके कारण उन्हें स्वराज्य की रक्षा के लिए वापस लौटना पड़ा। लेकिन इस हमले से पुर्तगाली इतने खौफजदा हो गए कि उन्होंने फिर कभी मराठों से सीधे टकराने की हिम्मत नहीं की।
संभाजी महाराज को महाराष्ट्र में प्यार से 'छावा' (शेर का शावक) कहा जाता है। लोककथाओं के अनुसार, अपनी युवावस्था में एक बार जंगल में शिकार के दौरान उनका सामना एक खूंखार शेर से हो गया था। तब बिना किसी हथियार के, केवल अपनी शारीरिक शक्ति के बल पर उन्होंने उस शेर से मल्ल-युद्ध किया और उसके जबड़े फाड़ दिए थे। उनका शरीर अत्यंत गठीला और मजबूत था।
औरंगजेब 5 लाख की विशाल सेना, अपार खजाना और अपनी पूरी ताकत लेकर 1681 में दक्षिण भारत (दक्कन) आया था। उसका सपना था कि वह छह महीने में मराठा साम्राज्य को कुचल देगा। लेकिन संभाजी महाराज ने अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति और तेज आक्रमणों से औरंगजेब को 9 साल तक उलझाए रखा। औरंगजेब मराठों का एक भी बड़ा किला नहीं जीत पाया। इस दौरान औरंगजेब इतना हताश हो गया था कि उसने एक बार गुस्से में अपनी पगड़ी जमीन पर फेंक दी थी और कसम खाई थी कि जब तक वह संभाजी को नहीं पकड़ लेता, पगड़ी नहीं पहनेगा।
फरवरी 1689 में, जब संभाजी महाराज अपने कुछ खास लोगों के साथ संगमेश्वर में थे, तब उनके अपने साले गणोजी शिर्के की गद्दारी के कारण मुगल सरदार मुकर्रब खान ने गुप्त रास्ता पार करके उन पर अचानक हमला कर दिया। संभाजी महाराज और उनके परम मित्र व सलाहकार कवि कलश को बंदी बना लिया गया।
उन्हें लोहे की जंजीरों में बांधकर जोकर के कपड़े पहनाकर औरंगजेब के सामने लाया गया। औरंगजेब ने उनके सामने तीन शर्तें रखीं:
मराठा साम्राज्य के सभी किले मुगलों को सौंप दो। स्वराज्य का सारा खजाना कहां है, यह बता दो। इस्लाम कबूल कर लो।
संभाजी महाराज ने औरंगजेब की आंखों में आंखें डालकर ये सभी शर्तें ठुकरा दीं। इसके बाद औरंगजेब ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। गर्म लोहे की सलाखों से उनकी आंखें फोड़ दी गईं। उनकी जीभ काट दी गई। उनके नाखूनों को उखाड़ लिया गया और खाल खींच ली गई। लगभग 40 दिनों तक उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं। इतनी पीड़ा सहने के बावजूद, संभाजी महाराज के मुंह से स्वराज्य या धर्म के खिलाफ एक शब्द नहीं निकला। अंततः 11 मार्च 1689 को फाल्गुन अमावस्या के दिन पुणे के पास तुलापुर में उनका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। इसी कारण उन्हें 'धर्मवीर' कहा जाता है।
औरंगजेब को लगा था कि संभाजी की मृत्यु के बाद मराठा डर जाएंगे और स्वराज्य खत्म हो जाएगा। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा। उनके इस भीषण बलिदान ने पूरे महाराष्ट्र में आग लगा दी। मराठा सरदार एकजुट हो गए और अगले 27 सालों तक मुगलों से लड़े (जिसे मराठा स्वातंत्र्य युद्ध कहा जाता है)। अंततः औरंगजेब की पूरी सेना नष्ट हो गई और 1707 में उसी दक्षिण की मिट्टी में औरंगजेब को दफन होना पड़ा। संभाजी महाराज का जीवन सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, मातृभूमि और अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।