80 घावों वाले अद्वितीय योद्धा और राजपूताना के गौरव
महाराणा संग्राम सिंह, जिन्हें दुनिया 'राणा सांगा' के नाम से जानती है, मेवाड़ के एक अत्यंत प्रतापी और अजेय योद्धा थे। वे एक ऐसे वीर थे जिन्होंने दिल्ली, मालवा और गुजरात के सुल्तानों को युद्ध में धूल चटाई थी। उनके शासनकाल में मेवाड़ अपनी शक्ति के चरम पर था।
राणा सांगा का शरीर वीरता का जीता-जागता प्रमाण था। उन्होंने अपने जीवनकाल में 100 से अधिक युद्ध लड़े थे। युद्धों में उनके शरीर पर 80 से ज़्यादा गहरे घाव थे। वे अपनी एक आँख, एक हाथ और एक पैर गँवा चुके थे, फिर भी उन्होंने रणभूमि में कभी पीठ नहीं दिखाई।
1527 में खानवा के ऐतिहासिक युद्ध में उन्होंने बाबर की मुग़ल सेना का सामना किया। इस युद्ध में राणा सांगा ने राजपूताना के सभी प्रमुख राजाओं को एक झंडे के नीचे लाकर मुगलों के खिलाफ खड़ा कर दिया था। युद्ध में बुरी तरह घायल होने के बावजूद वे तब तक लड़ते रहे जब तक वे बेहोश नहीं हो गए। उनका जीवन मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पण करने की सबसे बड़ी मिसाल है।
महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) का जीवन पराक्रम, अटूट संकल्प और भारतीय स्वाभिमान की रक्षा का प्रतीक है। उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है: प्रारंभिक जीवन और सत्ता का संघर्ष (1482–1509) जन्म: राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को चित्तौड़गढ़ में हुआ था। उनकी माता का नाम महारानी रतन कंवर था। भाइयों के साथ उत्तराधिकार का युद्ध: सांगा अपने पिता राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे। उनके बड़े भाइयों, पृथ्वीराज और जयमल, के साथ उनका सत्ता को लेकर कड़ा संघर्ष हुआ। इसी संघर्ष के दौरान एक विवाद में सांगा ने अपनी एक आँख खो दी थी। अज्ञातवास: भाइयों से जान बचाकर वे लंबे समय तक अजमेर के पास अज्ञातवास में रहे, जहाँ करमचंद पंवार ने उन्हें शरण दी। 1509 में भाइयों की मृत्यु के बाद वे मेवाड़ वापस लौटे और 26 वर्ष की आयु में उनका राज्याभिषेक हुआ।
राणा सांगा मध्यकालीन भारत के संभवतः एकमात्र ऐसे राजा थे जिन्होंने उत्तर भारत के लगभग सभी प्रमुख हिंदू शासकों को एक ध्वज के नीचे लाने में सफलता प्राप्त की थी।
राजपूत संघ: उन्होंने 7 राजाओं, 9 राव (उच्च श्रेणी के सरदार) और 104 बड़े रावत (सामंतों) का एक विशाल सैन्य संघ तैयार किया था।
पाती पेरण: इस परंपरा के तहत उन्होंने सभी राजाओं को पत्र लिखकर विदेशी आक्रमणकारियों (मुगलों) के खिलाफ एकजुट होने का निमंत्रण दिया। इसमें मारवाड़, आमेर, ग्वालियर, अजमेर, चंदेरी और बीकानेर जैसे राज्यों ने अपनी सेनाएँ भेजी थीं।
सैन्य शक्ति: इतिहासकारों के अनुसार, उनकी संयुक्त सेना में 80,000 घुड़सवार, 500 युद्धक हाथी और लगभग 1 से 2 लाख पैदल सैनिक शामिल थे।
राणा सांगा ने दिल्ली, मालवा और गुजरात के सुल्तानों के विरुद्ध 18 बड़े युद्ध लड़े
खातोली और धौलपुर का युद्ध (1517-18) सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को दो बार पराजित किया। खातोली के युद्ध में उन्होंने अपना एक हाथ खो दिया था।
गागरोन का युद्ध (1519) मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को हराकर सांगा ने उसे बंदी बना लिया, लेकिन बाद में उदारता दिखाते हुए उसे मुक्त कर दिया।
इदर का युद्ध (1520) उन्होंने गुजरात के सुल्तान की सेना को अहमदाबाद तक खदेड़ दिया और बड़ी जीत हासिल की।
बयाना का युद्ध (फरवरी 1527) खानवा से ठीक पहले सांगा ने बाबर की सेना को बुरी तरह हराकर मुगल खेमे में दहशत फैला दी थी।
खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527) यह युद्ध भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। राजपूत संघ: सांगा ने 'पाती पेरण' प्रथा के तहत पहली बार लगभग सभी राजपूत राजाओं (मारवाड़ के मालदेव, आमेर के पृथ्वीराज आदि) को एक झंडे के नीचे संगठित किया।
बाबर की आधुनिक तोपें: 'तुलुगमा' युद्ध पद्धति और कुछ सामंतों (जैसे रायसेन के सहलदी तंवर) के विश्वासघात के कारण सांगा की हार हुई।
गंभीर चोटें: युद्ध के दौरान उनके शरीर पर 80 घाव थे। घायल होने पर उन्हें मालदेव राठौड़ और पृथ्वीराज कछवाहा सुरक्षित स्थान पर ले गए।
प्रशासनिक सुधार: उन्होंने न्यायपालिका को मजबूत किया और प्रजा को त्वरित न्याय देने के लिए राज्य को प्रांतों में विभाजित किया।
धार्मिक सहिष्णुता: सांगा संत रविदास का बहुत आदर करते थे और उन्हें अपना गुरु मानते थे। उनकी पुत्रवधू मीराबाई (कुंवर भोजराज की पत्नी) ने भी रविदास से दीक्षा ली थी।
शपथ: होश आने पर सांगा ने प्रतिज्ञा की कि जब तक वे बाबर को पराजित नहीं कर देंगे, तब तक चित्तौड़ नहीं लौटेंगे। वे सिर पर पगड़ी के स्थान पर साफा (खंडा) बाँधने लगे थे।
मृत्यु: उनके कुछ सामंत और मंत्री और युद्ध नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने सांगा को जहर दे दिया। 30 जनवरी 1528 को कालपी (मध्य प्रदेश) में उनकी मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में किया गया, जहाँ उनकी छतरी आज भी स्थित है।
पत्नियां: उनकी 11 पत्नियां थीं, जिनमें रानी कर्णावती प्रमुख थीं।
पुत्र: उनके चार प्रमुख पुत्र थे—कुंवर भोजराज, रतन सिंह द्वितीय, विक्रमादित्य और उदय सिंह द्वितीय। उदय सिंह के पुत्र ही महान महाराणा प्रताप हुए
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