शकों द्वारा इसका सर्वाधिक उपयोग किए जाने के कारण ही इसका नाम 'शक संवत' (Saka Era) पड़ गया।
प्राचीन भारतीय और एशियाई इतिहास में सम्राट कनिष्क (Kanishka the Great) का नाम एक ऐसे विशाल और बहु-सांस्कृतिक साम्राज्य के निर्माता के रूप में दर्ज है, जिसकी सीमाएं मध्य एशिया से लेकर उत्तर भारत के सुदूर हिस्सों तक फैली हुई थीं। कनिष्क कुषाण राजवंश (Kushan Dynasty) के तीसरे और सबसे प्रतापी सम्राट थे। उनका शासनकाल (लगभग 78 ईस्वी से 144 ईस्वी तक) भारत के इतिहास में राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक उपलब्धियों का 'स्वर्ण युग' माना जाता है।
कनिष्क केवल एक क्रूर योद्धा या महान विजेता नहीं थे; वे कला, साहित्य और धर्म (विशेषकर बौद्ध धर्म) के सबसे बड़े संरक्षकों में से एक थे। इतिहास में उन्हें उनके साम्राज्य विस्तार, सिल्क रूट (Silk Road) पर नियंत्रण, और बौद्ध धर्म की महायान शाखा के विश्वव्यापी प्रचार के लिए जाना जाता है। इसी कारण इतिहासकार उन्हें 'द्वितीय अशोक' (Second Ashoka) कहकर भी संबोधित करते हैं।
आइए, मध्य एशिया के घुमंतू कबीलों से निकलकर अखंड भारत के एक बड़े भूभाग पर राज करने वाले इस चक्रवर्ती सम्राट कनिष्क महान के जीवन, युद्धों, प्रशासनिक व्यवस्था, सांस्कृतिक योगदान और उनकी अमर विरासत का अत्यंत विस्तृत वर्णन पढ़ें:
कनिष्क के इतिहास को समझने से पहले कुषाणों की उत्पत्ति को समझना आवश्यक है। कुषाण मूल रूप से भारत के निवासी नहीं थे। वे पश्चिमी चीन (तुर्कमेनिस्तान और झिंजियांग प्रांत) के पास रहने वाले एक खानाबदोश और लड़ाकू कबीले 'यूची' (Yuezhi / युइजि) की एक शाखा थे।
यूची कबीले का पलायन:
लगभग 165 ईसा पूर्व में, एक अन्य खूंखार कबीले 'हूणों' (Xiongnu) ने यूची कबीले पर हमला किया और उन्हें उनके मूल निवास स्थान से खदेड़ दिया। यूची कबीला मध्य एशिया की ओर भागा और वहां जाकर पांच छोटी-छोटी शाखाओं (कुलों) में बंट गया। इन्हीं पांच शाखाओं में से एक सबसे शक्तिशाली शाखा थी—कुइ-शुआंग (Kuei-shuang), जो बाद में 'कुषाण' कहलाई।
कुषाण साम्राज्य की स्थापना:
प्रथम शताब्दी ईस्वी के आसपास, कुषाण शाखा के एक महान नेता कुजुल कडफिसेस (Kujula Kadphises / कुषाण वंश का संस्थापक) ने यूची कबीले की सभी पांचों शाखाओं को एकजुट किया और हिंदूकुश पर्वत को पार करके अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत पर कब्ज़ा कर लिया। उसके बाद उसका पुत्र विम कडफिसेस (Vima Kadphises) गद्दी पर बैठा, जिसने भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के (Gold Coins) चलाए और साम्राज्य को मथुरा तक फैलाया। विम कडफिसेस के बाद ही कुषाण साम्राज्य की बागडोर सम्राट कनिष्क के हाथों में आई।
कनिष्क के राज्यारोहण (सिंहासन पर बैठने) की सटीक तिथि को लेकर इतिहासकारों में दशकों तक भारी बहस रही है, लेकिन अब अधिकांश आधुनिक इतिहासकार और पुरातात्विक साक्ष्य एक तिथि पर सहमत हैं—78 ईस्वी (78 AD/CE)।
शक संवत की स्थापना:
78 ईस्वी में अपने राज्याभिषेक के अवसर पर सम्राट कनिष्क ने एक नए कैलेंडर (पंचांग/संवत) की शुरुआत की। इस संवत का उपयोग कुषाणों के बाद भारत में शासन करने वाले 'शक क्षत्रपों' (Saka Satraps - जैसे रुद्रदामन) ने बहुत लंबे समय तक किया। शकों द्वारा इसका सर्वाधिक उपयोग किए जाने के कारण ही इसका नाम 'शक संवत' (Saka Era) पड़ गया।
आधुनिक भारत में इसका महत्व:
यह शक संवत भारतीय इतिहास में इतना प्रामाणिक और महत्वपूर्ण है कि आज़ादी के बाद 22 मार्च 1957 को भारत सरकार ने इसी 'शक संवत' को भारत के 'राष्ट्रीय पंचांग' (National Calendar of India) के रूप में आधिकारिक तौर पर अपना लिया। आज भी भारत सरकार के गजट और आकाशवाणी के प्रसारणों में ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ शक संवत का उपयोग किया जाता है (जिसका पहला महीना 'चैत्र' होता है)।
कनिष्क एक जन्मजात योद्धा और महान सेनापति थे। जब वे गद्दी पर बैठे, तब उन्हें अपने पिता से अफगानिस्तान, सिंध, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक का राज्य मिला था। लेकिन कनिष्क की महत्वाकांक्षाएं बहुत बड़ी थीं। उन्होंने चारों दिशाओं में अपने सैन्य अभियान चलाए और एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जिसकी सीमाएं मध्य एशिया (पामीर के पठार) से लेकर भारत में बिहार (पाटलिपुत्र) तक फैली थीं।
कनिष्क ने अपनी विशाल सेना के साथ पूर्व की ओर कूच किया और मगध की प्राचीन राजधानी पाटलिपुत्र (पटना) पर आक्रमण कर दिया।
कनिष्क के जीवन का सबसे रोमांचक और भयंकर युद्ध चीन के शक्तिशाली हान राजवंश के साथ हुआ था। यह युद्ध मध्य एशिया (विशेषकर तारिम बेसिन) के रेशम मार्ग (Silk Road) पर नियंत्रण के लिए लड़ा गया था।
राजतरंगिणी (कल्हण द्वारा रचित कश्मीर का इतिहास) के अनुसार कनिष्क ने कश्मीर पर विजय प्राप्त की और वहां 'कनिष्कपुर' (Kanishkapura) नामक एक भव्य नगर बसाया, जिसे आज बारामूला जिले में 'कनिस्पोर' के नाम से जाना जाता है।
कनिष्क का साम्राज्य इतना विशाल था कि इसे एक जगह से नियंत्रित करना असंभव था। इसलिए उन्होंने अपने साम्राज्य के लिए दो राजधानियां बनाईं:
1. प्राथमिक राजधानी (Primary Capital) - पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर, पाकिस्तान):
यह कनिष्क के साम्राज्य का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र था। चूंकि कुषाण साम्राज्य मध्य एशिया और भारत के बीच फैला था, इसलिए हिंदूकुश के पास स्थित पुरुषपुर एक रणनीतिक केंद्र (Strategic point) था। यहीं से वे भारत और मध्य एशिया दोनों पर नज़र रखते थे।
2. द्वितीयक राजधानी (Secondary Capital) - मथुरा (उत्तर प्रदेश, भारत):
मथुरा उनके साम्राज्य की सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक राजधानी थी। गंगा-यमुना के उपजाऊ मैदान में स्थित होने के कारण यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र भी था। मथुरा से कुषाणों की कई मूर्तियां मिली हैं, जिनमें कनिष्क की सिरकटी मूर्ति (Headless statue) सबसे प्रसिद्ध है।
अपने प्रारंभिक जीवन में कनिष्क संभवतः कई देवताओं (ईरानी, ग्रीक और हिंदू देवताओं) के उपासक थे। लेकिन पाटलिपुत्र विजय के बाद महान विद्वान अश्वघोष के संपर्क में आने से उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव आया और उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया।
जिस प्रकार कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को विश्व धर्म बनाया था, उसी प्रकार कनिष्क ने भी बौद्ध धर्म को भारत की सीमाओं से निकालकर चीन, जापान, कोरिया और तिब्बत तक पहुँचाया। उनके शासनकाल में बौद्ध धर्म में एक बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन हुआ—महायान (Mahayana) शाखा का उदय।
हीनयान बनाम महायान:
इससे पहले बौद्ध धर्म 'हीनयान' (Hinayana) के रूप में था, जिसमें भगवान बुद्ध को एक साधारण महापुरुष और मार्गदर्शक माना जाता था, और मूर्तियों की पूजा नहीं होती थी। लेकिन कनिष्क के समय में 'महायान' (Greater Vehicle) शाखा का विकास हुआ। महायान में बुद्ध को भगवान (ईश्वर) मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा शुरू की गई, और बोधिसत्वों (Bodhisattvas) की परिकल्पना की गई। कनिष्क महायान शाखा के सबसे बड़े उन्नायक और संरक्षक बने।
कनिष्क के शासनकाल की सबसे युगांतरकारी धार्मिक घटना चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन था। बौद्ध धर्म में उस समय 18 से अधिक संप्रदाय बन गए थे और उनके बीच ग्रंथों की व्याख्याओं को लेकर गहरे मतभेद पैदा हो गए थे। इन मतभेदों को सुलझाने के लिए कनिष्क ने एक विशाल सम्मेलन बुलाया।
भले ही कनिष्क एक महान बौद्ध सम्राट थे, लेकिन उनकी धार्मिक नीति अत्यंत सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष (Secular) थी। इसका सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण कनिष्क के सिक्के हैं। कनिष्क ने अपने शासनकाल में तांबे और उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले सोने के सिक्के (जिन्हें 'दीनार' कहा जाता था) बड़ी संख्या में ढलवाए।
इन सिक्कों पर एक तरफ स्वयं कनिष्क की आकृति होती थी (लंबा कोट और भारी जूते पहने हुए, जो कुषाणों की मध्य एशियाई पोशाक थी, अग्नि वेदी पर आहुति देते हुए)। और दूसरी तरफ विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के देवताओं की आकृतियां उकेरी गई थीं:
यह इस बात का प्रमाण है कि कनिष्क का साम्राज्य एक 'सच्चा धर्मनिरपेक्ष साम्राज्य' था, जहाँ सभी संस्कृतियों के लोगों और देवताओं को बराबर का सम्मान दिया जाता था।
कनिष्क के शासनकाल में वास्तुकला और मूर्तिकला अपने चरम पर पहुँच गई। इसी समय भारत में मूर्तिकला की दो बिल्कुल अलग और महान शैलियों का विकास हुआ:
यह शैली उत्तर-पश्चिमी भारत (वर्तमान पाकिस्तान/अफगानिस्तान के पेशावर और स्वात घाटी) में विकसित हुई। इसे 'ग्रीको-बुद्धिस्ट कला' (Greco-Buddhist Art) भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें विषय तो भारतीय (बौद्ध) थे, लेकिन मूर्तियों को बनाने का तरीका यूनानी (ग्रीक) था।
यह पूरी तरह से स्वदेशी (Indigenous) भारतीय कला शैली थी, जो मथुरा और उसके आसपास विकसित हुई।
कनिष्क ने अपनी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) में एक विशाल और गगनचुंबी स्तूप का निर्माण करवाया था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Hiuen Tsang) के अनुसार, यह स्तूप लकड़ी और पत्थर से बना था और इसकी ऊंचाई लगभग 400 फीट (13 मंज़िला इमारत के बराबर) थी। यह उस समय की दुनिया की सबसे ऊंची इमारतों में से एक थी। 1908 में जब ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने पेशावर (शाहजी की ढेरी) में खुदाई की, तो उन्हें इस स्तूप के अवशेष और 'कनिष्क का कास्केट' (Kanishka Casket) मिला, जिसमें भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष (हड्डियां) रखे हुए थे।
कनिष्क न केवल शस्त्रों के धनी थे, बल्कि वे शास्त्रों और विद्या के भी बहुत बड़े पारखी थे। उनका दरबार भारत के कुछ सबसे महान दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और कवियों से सुशोभित था:
कनिष्क के साम्राज्य की अपार धन-दौलत और शक्ति का सबसे बड़ा रहस्य उनका 'सिल्क रूट' (Silk Road) पर पूर्ण नियंत्रण था।
सिल्क रूट प्राचीन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग था, जो चीन से शुरू होकर मध्य एशिया, ईरान और तुर्की होते हुए रोमन साम्राज्य (यूरोप) तक जाता था। कनिष्क के साम्राज्य की सीमाएं इस तरह फैली थीं कि सिल्क रूट की तीन मुख्य शाखाएं उनके साम्राज्य (हिंदूकुश, बैक्टीरिया और कश्मीर) से होकर गुजरती थीं।
एक सम्राट जिसने अपना पूरा जीवन युद्ध के मैदानों और घोड़ों की पीठ पर बिताया, उसका अंत भी उतना ही रहस्यमयी और नाटकीय था।
हत्या की किंवदंती:
कनिष्क की महत्वाकांक्षाओं की कोई सीमा नहीं थी। बुढ़ापे में भी वे नए-नए क्षेत्रों (विशेषकर उत्तर के ठंडे इलाकों) को जीतने की योजनाएं बना रहे थे। चीनी किंवदंतियों और कुछ बौद्ध स्रोतों के अनुसार, कनिष्क की सेना लगातार युद्ध करते-करते और दूर-दराज के बर्फीले इलाकों में भटकते-भटकते पूरी तरह थक चुकी थी। कनिष्क के सैनिक और जनरल घर लौटना चाहते थे, लेकिन राजा उन्हें आराम नहीं करने दे रहे थे।
कहा जाता है कि जब एक दिन सम्राट कनिष्क अपने तंबू (Tent) में बीमार पड़े थे, तो उनके ही थके हुए सेनापतियों (Generals) ने मिलकर उनके मुंह पर कंबल या रजाई दबाकर उनकी दम घोंटकर हत्या कर दी (Smothered to death)। लगभग 144 ईस्वी (144 CE) के आसपास इस महान विजेता का दुखद अंत हो गया।
उत्तराधिकारी और पतन:
कनिष्क की मृत्यु के बाद उनके पुत्र वसिष्क (Vashishka) और उसके बाद हुविष्क (Huvishka) गद्दी पर बैठे। हुविष्क एक योग्य शासक था जिसने साम्राज्य को बनाए रखा, लेकिन उसके बाद कुषाण साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। अंतिम महान कुषाण शासक वासुदेव प्रथम (Vasudeva I) था, जिसके नाम से ही स्पष्ट है कि कुषाणों ने पूरी तरह से भारतीय हिंदू संस्कृति (वैष्णव/शैव धर्म) को अपना लिया था। तीसरी शताब्दी ईस्वी आते-आते, ईरान के सासानियन (Sassanid) साम्राज्य और भारत में उभरते हुए शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य (Gupta Empire) ने कुषाण साम्राज्य को पूरी तरह से समाप्त कर दिया।
सम्राट कनिष्क का स्थान भारतीय और एशियाई इतिहास में अद्वितीय है। उनकी महानता केवल उनके सैन्य विजयों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस सांस्कृतिक पुल के निर्माण में है जो उन्होंने पूर्व (भारत/चीन) और पश्चिम (रोम/ग्रीस) के बीच बनाया था।
निष्कर्षतः, सम्राट कनिष्क महान एक ऐसे विदेशी मूल के शासक थे जिन्होंने न केवल भारतीय मिट्टी को अपनाया, बल्कि भारतीय संस्कृति, धर्म और ज्ञान को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाकर उसे गौरवान्वित किया। जब तक सिल्क रूट का इतिहास और बुद्ध की मूर्तियां दुनिया में मौजूद रहेंगी, सम्राट कनिष्क का नाम इतिहास के पन्नों में एक चक्रवर्ती सम्राट के रूप में चमकता रहेगा।