चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के सबसे प्रतापी, विद्वान, न्यायप्रिय तथा प्रभावशाली सम्राटों में गिने जाते हैं।
प्रस्तावना : भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास में अनेक ऐसे महान सम्राट हुए जिन्होंने अपने पराक्रम, बुद्धिमत्ता और प्रशासनिक क्षमता से देश को गौरवान्वित किया। उन महान शासकों में चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम अत्यन्त सम्मान के साथ लिया जाता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के सबसे प्रतापी, विद्वान, न्यायप्रिय तथा प्रभावशाली सम्राटों में गिने जाते हैं। उन्हें उनके अद्वितीय साहस, शौर्य, युद्धकौशल तथा प्रजावत्सल स्वभाव के कारण “विक्रमादित्य” की उपाधि प्राप्त हुई। वे लगभग 375 से 415 ईस्वी के बीच शासन करने वाले गुप्त साम्राज्य के अत्यन्त शक्तिशाली सम्राट माने जाते हैं।
उनके शासनकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्णिम काल कहा जाता है क्योंकि इस समय भारत में साहित्य, कला, विज्ञान, स्थापत्य, व्यापार, शिक्षा, संस्कृति और समृद्धि का अभूतपूर्व विकास हुआ। इतिहासकार मानते हैं कि उनके शासन में गुप्त साम्राज्य अपनी सर्वोच्च उन्नति पर पहुँचा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय का जन्म लगभग 4वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ माना जाता है। उनके जन्म की सटीक तिथि इतिहास में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, किन्तु यह निश्चित है कि उनका जन्म गुप्त साम्राज्य के राजमहल में हुआ था। वे बचपन से ही अत्यन्त तेजस्वी, बुद्धिमान, साहसी तथा अनुशासित थे। उनके व्यक्तित्व में नेतृत्व क्षमता बचपन से ही दिखाई देने लगी थी।
कहा जाता है कि जब अन्य बालक सामान्य खेलों में समय बिताते थे, तब चन्द्रगुप्त युद्धकला, राजनीति, घुड़सवारी और शास्त्रों के अध्ययन में अधिक रुचि लेते थे। बाल्यकाल से ही उनके भीतर एक महान शासक बनने के सभी गुण दिखाई देने लगे थे।
पिता : समुद्रगुप्त – गुप्त वंश के महान विजेता और अत्यन्त पराक्रमी सम्राट थे, जिन्होंने गुप्त साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार किया।
माता : दत्तादेवी – इतिहासकारों द्वारा उन्हें चन्द्रगुप्त द्वितीय की माता माना जाता है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय को अपने पिता से वीरता और शासनकौशल विरासत में प्राप्त हुआ। समुद्रगुप्त स्वयं महान योद्धा थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को भी प्रारम्भ से ही युद्ध और शासन की शिक्षा दिलवाई।
चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश से सम्बन्ध रखते थे, जो प्राचीन भारत का एक अत्यन्त शक्तिशाली और गौरवशाली राजवंश था। गुप्त वंश की स्थापना श्रीगुप्त ने की थी, किन्तु इस वंश को महानता तक पहुँचाने में चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय का सबसे अधिक योगदान रहा।
इतिहास में चन्द्रगुप्त द्वितीय के भाई के रूप में रामगुप्त का उल्लेख कुछ ग्रन्थों में मिलता है। कुछ कथाओं के अनुसार रामगुप्त उनके बड़े भाई थे, किन्तु इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है।
बहनों का स्पष्ट ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने राजकुमारों के अनुरूप उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें निम्नलिखित विषयों का ज्ञान कराया गया था :
• वेद और उपनिषद
• राजनीति और कूटनीति
• अर्थशास्त्र
• युद्धकला
• धनुर्विद्या
• तलवारबाजी
• गदा युद्ध
• अश्व संचालन
• हाथी संचालन
• सेना संचालन
• न्यायशास्त्र
• काव्य और साहित्य
वे केवल योद्धा ही नहीं बल्कि अत्यन्त विद्वान और ज्ञानवान भी थे।
चन्द्रगुप्त द्वितीय को अत्यन्त न्यायप्रिय, विद्वान और बुद्धिमान राजा माना जाता है। वे जटिल समस्याओं का समाधान बड़ी सरलता से कर लेते थे। दरबार में होने वाले विवादों का निर्णय वे निष्पक्षता से करते थे। उनकी बुद्धिमत्ता के कारण ही उन्हें “विक्रमादित्य” की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है “पराक्रम का सूर्य”। “विक्रमादित्य” उपाधि का सम्बन्ध उनके नाम से जोड़ा जाता है और इसे उन्होंने अपनाया था।
समुद्रगुप्त के पश्चात् चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त साम्राज्य के शासक बने। अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि उन्होंने लगभग 375 ईस्वी के आसपास शासन संभाला।
कुछ कथाओं के अनुसार उन्हें सिंहासन प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ा, किन्तु अन्ततः वे अपनी वीरता और बुद्धिमत्ता से गद्दी पर बैठे।
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल लगभग 375 ईस्वी से 415 ईस्वी तक माना जाता है। इस अवधि में गुप्त साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने “विक्रमादित्य” की उपाधि धारण की थी। यह उपाधि उनके महान पराक्रम, शौर्य, वीरता और दानशीलता के कारण प्रसिद्ध हुई।
जनमानस में वे इतने लोकप्रिय हुए कि आगे चलकर अनेक लोककथाओं में विक्रमादित्य नाम से उनका उल्लेख होने लगा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय महान योद्धा थे। उन्होंने अनेक युद्ध किए और गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया।
उनकी सबसे प्रसिद्ध विजय पश्चिमी क्षत्रपों (शकों) पर थी। उन्होंने पश्चिमी भारत के शक शासकों को पराजित किया और मालवा, गुजरात तथा सौराष्ट्र पर अधिकार कर लिया। इस विजय से गुप्त साम्राज्य का विस्तार पश्चिम दिशा में बहुत बढ़ गया।
उन्होंने पूर्वी क्षेत्रों के अनेक शासकों को भी अधीन किया और साम्राज्य को अधिक संगठित बनाया।
उनके शासन में साम्राज्य पश्चिम से पूर्व तक अत्यन्त विस्तृत हो गया और भारत के बड़े भूभाग पर उनका प्रभाव स्थापित हुआ।
कहा जाता है कि शक शासकों के विरुद्ध युद्ध के समय उनकी सेना भयभीत हो उठी। तब चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कहा :
“जो वीर अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा करता है, वही सच्चा अमर होता है।”
उनकी यह वाणी सुनकर सेना में नया उत्साह भर गया और सबने विजय प्राप्त की।
उनकी मुख्य राजधानी पाटलिपुत्र थी, किन्तु उज्जयिनी को भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्र बनाया। कुछ स्रोतों में उज्जैन को उनके द्वितीय राजधानी केन्द्र के रूप में वर्णित किया गया है।
किंवदन्तियों में कहा जाता है कि उनके दरबार में नौ महान विद्वान थे जिन्हें “नवरत्न” कहा गया। परम्परा में इनसे कालिदास आदि का नाम जोड़ा जाता है, यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इन कथाओं के कुछ भागों को लोकपरम्परा मानते हैं। चन्द्रगुप्त द्वितीय का दरबार विद्वानों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध था।
इनमें प्रसिद्ध नाम परम्परागत रूप से बताए जाते हैं :
• कालिदास
• वराहमिहिर
• अमरसिंह
• धन्वन्तरि
• वररुचि
• क्षपणक
• घटकर्पर
• शंकु
• वेतालभट्ट
चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में साहित्य, संगीत, कला, मूर्तिकला और स्थापत्य कला का अत्यधिक विकास हुआ। उनके काल में भारत की सांस्कृतिक उन्नति अपने शिखर पर पहुँची।
महाकवि कालिदास जैसे महान साहित्यकार इसी काल से जुड़े माने जाते हैं।
चन्द्रगुप्त द्वितीय हिन्दू धर्म के अनुयायी थे तथा विष्णु भक्ति से जुड़े माने जाते हैं। कुछ अभिलेख उन्हें परम भागवत बताते हैं।
वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे और धार्मिक सहिष्णुता रखते थे।
उनकी पत्नियों में ध्रुवदेवी तथा कुबेरनागा का उल्लेख मिलता है।
उनकी प्रमुख सन्तानों में निम्न नाम प्रसिद्ध हैं :
• कुमारगुप्त प्रथम – जो आगे चलकर सम्राट बने।
• प्रभावतीगुप्ता – जिनका विवाह वाकाटक वंश में हुआ।
उनका प्रशासन अत्यन्त व्यवस्थित और सुदृढ़ था। उन्होंने राज्य को विभिन्न प्रान्तों में विभाजित किया और प्रत्येक स्थान पर योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की।
उनके प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ :
• न्यायप्रिय शासन
• संगठित कर व्यवस्था
• शक्तिशाली सेना
• स्थानीय प्रशासन पर ध्यान
• व्यापार संरक्षण
उनके शासनकाल में व्यापार और उद्योग अत्यधिक उन्नत हुए। पश्चिमी क्षेत्रों पर विजय के बाद समुद्री व्यापार में वृद्धि हुई क्योंकि गुजरात और पश्चिमी बंदरगाहों पर उनका नियंत्रण स्थापित हुआ। यह विजय आर्थिक रूप से अत्यन्त लाभकारी रही।
चीनी यात्री फाह्यान उनके काल में भारत आया था और उसने भारतीय समाज की शान्ति, समृद्धि और सुशासन का वर्णन किया। उसका भारत आगमन चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय माना जाता है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय का स्वभाव अत्यन्त शान्त, विनम्र, न्यायप्रिय और उदार बताया जाता है। वे अपनी प्रजा से प्रेम करते थे और उनकी समस्याओं को स्वयं सुनते थे।
वे अत्यन्त दानी थे। निर्धनों, विद्वानों, ब्राह्मणों और जरूरतमन्दों को दान देना उन्हें प्रिय था।
उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली, तेजस्वी और प्रेरणादायक था। वे युद्धभूमि में सिंह समान और सभा में ऋषि समान माने जाते थे।
चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु लगभग 415 ईस्वी के आसपास मानी जाती है। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र कुमारगुप्त प्रथम ने शासन संभाला।
चन्द्रगुप्त द्वितीय को भारत के महानतम सम्राटों में गिना जाता है। उनका शासन भारतीय इतिहास के सबसे गौरवपूर्ण कालों में से एक माना जाता है। उन्होंने भारत को केवल सैन्य शक्ति ही नहीं दी बल्कि सांस्कृतिक, साहित्यिक और आर्थिक समृद्धि भी प्रदान की।
चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) भारतीय इतिहास के ऐसे महान सम्राट थे जिन्होंने अपने अद्भुत पराक्रम, बुद्धिमत्ता, न्यायप्रियता और सांस्कृतिक संरक्षण से भारत को गौरवशाली बनाया। वे एक ऐसे राजा थे जिनमें योद्धा की वीरता, विद्वान की बुद्धि, न्यायाधीश की निष्पक्षता और संत की करुणा थी। उनके शासनकाल में भारत ने उन्नति, समृद्धि, ज्ञान और कला के क्षेत्र में जो ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं, वे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। उनका जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि महानता केवल शक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान, न्याय, परिश्रम और जनकल्याण से प्राप्त होती है।