चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम भारतीय इतिहास में एक ऐसे ध्रुव तारे के समान है।
चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम भारतीय इतिहास में एक ऐसे ध्रुव तारे के समान है, जिसने पहली बार बंटे हुए भारतीय उपमहाद्वीप को एक छत्र के नीचे लाकर 'अखंड भारत' के निर्माण का स्वप्न साकार किया। उनका जीवन केवल एक राजा की कहानी नहीं है, बल्कि यह अदम्य साहस, कूटनीति, प्रचंड संघर्ष और गुरु-शिष्य की उस महान परंपरा की गाथा है जिसने विश्व पटल पर भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया।
नीचे चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म से लेकर उनके साम्राज्य निर्माण, महायुद्धों, प्रशासनिक व्यवस्था और उनके अंतिम दिनों का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत है।
चन्द्रगुप्त मौर्य के उदय से पहले (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व), भारत राजनीतिक रूप से अत्यंत विखंडित था। उत्तर-पश्चिम भारत (वर्तमान पंजाब, सिंध और अफगानिस्तान) छोटे-छोटे जनपदों और गणराज्यों में बंटा हुआ था, जो आपस में लड़ते रहते थे। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर यूनानी आक्रांता सिकंदर (Alexander the Great) ने भारत पर आक्रमण किया था।
दूसरी ओर, पूर्वी और मध्य भारत में नंद वंश का विशाल साम्राज्य था, जिसकी राजधानी मगध (वर्तमान बिहार में पाटलिपुत्र) थी। इस समय मगध की गद्दी पर क्रूर और विलासी राजा धनानंद बैठा था। वह जनता पर भारी कर लगाता था और प्रजा उससे बेहद नफरत करती थी। इसी राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी आक्रमण के भय और आंतरिक अत्याचार के माहौल में चन्द्रगुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणक्य का उदय हुआ।
चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश और प्रारंभिक जीवन को लेकर प्राचीन इतिहासकारों और ग्रंथों में गहरे मतभेद हैं। विभिन्न स्रोतों में उनकी उत्पत्ति के अलग-अलग वृत्तांत मिलते हैं:
भले ही उनके जन्म को लेकर विवाद हो, लेकिन इस बात पर सभी सहमत हैं कि उनका बचपन अत्यंत कठिनाइयों में बीता और वे जन्म से कोई राजकुमार नहीं थे।
चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात तक्षशिला के महान विद्वान आचार्य चाणक्य (कौटिल्य/विष्णुगुप्त) से हुई।
चाणक्य का संकल्प: चाणक्य मगध के दरबार में गए थे, जहां राजा धनानंद ने उनके ब्राह्मण रूप और विचारों का घोर अपमान किया। क्रोधित होकर चाणक्य ने अपनी शिखा (चोटी) खोल दी और प्रतिज्ञा की कि जब तक वह नंद वंश का समूल नाश नहीं कर देंगे, तब तक शिखा नहीं बांधेंगे।
चन्द्रगुप्त की खोज:
मगध से लौटते समय, विंध्याचल के जंगलों में चाणक्य ने कुछ बच्चों को 'राजकीलकम' (राजा और प्रजा का खेल) खेलते देखा। उस खेल में एक बालक राजा बना था और बहुत ही न्यायपूर्ण तरीके से बाकी बच्चों के विवाद सुलझा रहा था। उस बालक के चेहरे का तेज, उसकी निडरता और नेतृत्व क्षमता देखकर चाणक्य समझ गए कि यही वह व्यक्ति है जो भारत को एक सूत्र में बांध सकता है। चाणक्य ने उस बालक (चन्द्रगुप्त) को एक हजार कार्षापण (उस समय की मुद्रा) देकर शिकारी से खरीद लिया।
तक्षशिला में कठोर प्रशिक्षण:
चाणक्य चन्द्रगुप्त को लेकर तक्षशिला विश्वविद्यालय गए, जो उस समय विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र था। अगले 7 से 8 वर्षों तक चन्द्रगुप्त को युद्ध कला, राजनीति, अर्थशास्त्र, कूटनीति (साम, दाम, दंड, भेद), और दर्शनशास्त्र का गहन और कठोर प्रशिक्षण दिया गया। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को एक साधारण बालक से एक अजेय योद्धा और चतुर राजनेता बना दिया।
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, गुरु और शिष्य ने नंद वंश को उखाड़ फेंकने की योजना बनानी शुरू की।
सेना का गठन:
उनके पास कोई शाही सेना नहीं थी। चाणक्य ने अपनी कूटनीति से एक 'भाड़े की सेना' (Mercenary army) तैयार की। इस सेना में चोर, डाकू, वनवासी (आटविक), म्लेच्छ, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा पंजाब के वे लड़ाके शामिल थे जो सिकंदर के आक्रमण से परेशान थे।
पहली बड़ी रणनीतिक भूल (गर्म खिचड़ी की कथा):
युवा चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने जोश में आकर सीधे मगध के केंद्र (पाटलिपुत्र) पर हमला कर दिया। धनानंद की विशाल सेना के सामने उनकी छोटी सी सेना टिक नहीं पाई और उन्हें अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।
बौद्ध और जैन ग्रंथों में एक प्रसिद्ध कथा है: जब वे भेष बदलकर भाग रहे थे, तो उन्होंने एक झोपड़ी में आश्रय लिया। वहाँ एक बुढ़िया अपने पोते को गर्म खिचड़ी (या रोटी) खिला रही थी। बच्चे ने बीच में उंगली डाली और जल गया। तब बुढ़िया ने कहा— "तू भी चन्द्रगुप्त और चाणक्य जैसी मूर्खता कर रहा है। सीधे बीच (राजधानी) में हाथ डालेगा तो जलेगा ही। पहले किनारों (सीमावर्ती राज्यों) को ठंडा कर, फिर बीच में हाथ डाल।"
इस घटना ने दोनों की आंखें खोल दीं।
अपनी रणनीति बदलते हुए, चन्द्रगुप्त ने पहले उत्तर-पश्चिम भारत (पंजाब और सिंध) को यूनानी क्षत्रपों (गवर्नरों) से मुक्त कराने का फैसला किया।
अब चन्द्रगुप्त एक विशाल और अनुभवी सेना के स्वामी थे। उन्होंने हिमालय के एक राजा 'पर्वतक' (कुछ इतिहासकार इसे राजा पोरस मानते हैं) के साथ गठबंधन किया।
युद्ध की रणनीति:
अब चन्द्रगुप्त ने सीधे राजधानी पर हमला करने के बजाय मगध साम्राज्य के सीमावर्ती इलाकों को जीतना शुरू किया। वे गाँवों और किलों को जीतते, वहां अपनी सेना की टुकड़ी तैनात करते और फिर आगे बढ़ते। इससे नंदों की सेना कमजोर पड़ने लगी。
पाटलिपुत्र की घेराबंदी:
अंततः चन्द्रगुप्त की सेना ने मगध की राजधानी पाटलिपुत्र को घेर लिया। धनानंद के पास भी एक बहुत बड़ी सेना थी (जिसमें लाखों पैदल सैनिक और हजारों हाथी थे)। मुद्राराक्षस के अनुसार, यह युद्ध अत्यंत भयंकर और रक्तरंजित था।
चाणक्य ने केवल बल का नहीं, बल्कि छल और जासूसी का भी भरपूर उपयोग किया। धनानंद के मुख्यमंत्री अमात्य राक्षस को चाणक्य ने अपनी कूटनीति से निष्प्रभावी कर दिया। युद्ध में धनानंद की पूरी तरह हार हुई। कुछ स्रोतों के अनुसार धनानंद युद्ध में मारा गया, जबकि कुछ का मानना है कि उसे कुछ धन देकर संन्यास लेने के लिए छोड़ दिया गया।
लगभग 322 ईसा पूर्व में 25 वर्ष की आयु में चन्द्रगुप्त मौर्य मगध के सिंहासन पर बैठे और मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई।
चन्द्रगुप्त का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक युद्ध सिकंदर के पूर्व सेनापति और सीरिया के तत्कालीन राजा सेल्यूकस निकेटर (Seleucus I Nicator) के साथ हुआ। यह युद्ध भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर है क्योंकि इसने भारत की सीमाओं को सुरक्षित कर दिया।
युद्ध की पृष्ठभूमि:
सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य को उसके सेनापतियों ने आपस में बांट लिया था। एशियाई हिस्से का शासक सेल्यूकस निकेटर बना। उसका सपना सिकंदर के अधूरे काम को पूरा करना और भारत के उन हिस्सों पर वापस कब्ज़ा करना था जिन्हें चन्द्रगुप्त ने छीन लिया था। 305 ईसा पूर्व में सेल्यूकस एक विशाल यूनानी सेना लेकर सिंधु नदी के किनारे आ धमका।
सिंधु का रणक्षेत्र:
लेकिन सेल्यूकस को यह नहीं पता था कि अब उसका सामना बंटे हुए भारत के छोटे राजाओं से नहीं, बल्कि एक संगठित और अत्यंत शक्तिशाली मौर्य साम्राज्य से था। चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी 6 लाख सैनिकों की विशाल सेना और 9000 युद्ध हाथियों के साथ तैयार थे।
यूनानी सेना, जो अपने घुड़सवारों और भालाधारियों के लिए प्रसिद्ध थी, चन्द्रगुप्त के हाथियों के विशाल दस्ते के सामने टिक नहीं सकी। भारतीय सेना की व्यूह रचना और प्रचंड शक्ति ने यूनानियों के हौसले पस्त कर दिए। युद्ध में सेल्यूकस की करारी हार हुई।
ऐतिहासिक संधि और परिणाम:
अपनी जान और बची हुई सेना को बचाने के लिए सेल्यूकस को चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ एक बहुत ही अपमानजनक (यूनानियों के दृष्टिकोण से) लेकिन ऐतिहासिक संधि करनी पड़ी:
इस युद्ध ने यह साबित कर दिया कि चन्द्रगुप्त मौर्य उस समय एशिया के सबसे शक्तिशाली सम्राट थे。
सेल्यूकस को हराने के बाद चन्द्रगुप्त शांत नहीं बैठे। उन्होंने भारत को भौगोलिक रूप से एक करने का अभियान जारी रखा।
चन्द्रगुप्त मौर्य केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट प्रशासक भी थे। चाणक्य के मार्गदर्शन में उन्होंने एक ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित की जो सदियों तक आने वाले साम्राज्यों के लिए एक मॉडल बनी रही।
मेगास्थनीज ने पाटलिपुत्र को दुनिया का सबसे बड़ा और सुंदर नगर बताया है। यह गंगा और सोन नदी के संगम पर बसा था। शहर के चारों ओर लकड़ी की एक विशाल दीवार थी जिसमें 64 प्रवेश द्वार और 570 टॉवर (बुर्ज) थे।
नगर का प्रशासन 30 सदस्यों वाली एक परिषद चलाती थी, जो 5-5 सदस्यों की 6 समितियों में बंटी थी:
प्लिनी और प्लूटार्क जैसे रोमन-यूनानी लेखकों के अनुसार, चन्द्रगुप्त की सेना में:
सेना का प्रबंधन भी 6 समितियों (प्रत्येक में 5 सदस्य) द्वारा किया जाता था जो पैदल सेना, घुड़सवार, रथ, हाथी, नौसेना (Navy) और यातायात/रसद (Logistics) का काम देखती थीं। सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था और राज्य उनकी युद्ध सामग्री की पूरी व्यवस्था करता था।
चाणक्य के अर्थशास्त्र में राजा के लिए गुप्तचरों के महत्व को बहुत गहराई से समझाया गया है। चन्द्रगुप्त के पास एक अत्यंत मजबूत खुफिया नेटवर्क था।
चन्द्रगुप्त का जीवन हमेशा खतरों से घिरा रहता था, क्योंकि उन्होंने कई शत्रुओं का नाश करके गद्दी प्राप्त की थी। उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में कुछ बहुत ही रोचक तथ्य मिलते हैं:
चन्द्रगुप्त मौर्य का अंत उनके जीवन के युद्धों जितना ही नाटकीय और दार्शनिक था।
मगध में भयंकर अकाल:
जैन ग्रंथों (जैसे भद्रबाहुचरित और परिशिष्टपर्वन) के अनुसार, चन्द्रगुप्त के शासनकाल के अंतिम वर्षों में मगध में 12 वर्षों तक लगातार भयंकर सूखा और अकाल पड़ा। चन्द्रगुप्त ने अकाल राहत के लिए कई उपाय किए, राज्य के अन्न भंडार खोल दिए, लेकिन जनता के दुख को देखकर वे अंदर से टूट गए। उन्हें लगा कि एक राजा के रूप में वे अपनी प्रजा की रक्षा करने में विफल हो रहे हैं या शायद उनके पिछले युद्धों के पापों का दंड प्रजा को मिल रहा है।
जैन धर्म का प्रभाव और वैराग्य:
इसी समय वे महान जैन संत आचार्य भद्रबाहु के संपर्क में आए। उनके आध्यात्मिक उपदेशों ने चन्द्रगुप्त के मन में वैराग्य उत्पन्न कर दिया। 24 वर्षों तक अखंड साम्राज्य पर राज करने के बाद, चन्द्रगुप्त ने सत्ता, धन और वैभव को त्यागने का निश्चय किया。
राजत्याग और दक्षिण की यात्रा:
लगभग 298 ईसा पूर्व में चन्द्रगुप्त ने अपना राजपाट और विशाल साम्राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार (सम्राट अशोक के पिता) को सौंप दिया। राजमुकुट उतारकर उन्होंने एक साधारण जैन भिक्षु के वस्त्र धारण कर लिए। वे आचार्य भद्रबाहु और उनके 12,000 जैन भिक्षुओं के दल के साथ पैदल ही दक्षिण भारत की ओर निकल पड़े।
श्रवणबेलगोला में जीवन का अंत:
वे कर्नाटक के मैसूर के पास श्रवणबेलगोला (Shravanabelagola) की पहाड़ियों पर पहुँचे। जिस पहाड़ी पर उन्होंने तपस्या की, उसे आज भी 'चन्द्रगिरी पहाड़ी' कहा जाता है।
वहां चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म की अत्यंत कठिन और पवित्र प्रथा 'संलेखना' (या संथारा) को अपनाया। इस प्रथा में व्यक्ति धीरे-धीरे अपने भोजन और जल का त्याग कर देता है और ध्यान में लीन होकर अपने शरीर को त्याग देता है।
अपने गुरु के वचनों का पालन करते हुए, विश्व के सबसे शक्तिशाली सम्राटों में से एक ने, जिसने कभी लाखों की सेना का नेतृत्व किया था, महीनों तक निराहार रहकर शांति से अपने प्राण त्याग दिए।
चन्द्रगुप्त मौर्य का भारतीय इतिहास में वही स्थान है जो यूरोप में सिकंदर या रोम में जूलियस सीज़र का है, लेकिन उनका चरित्र उन दोनों से कहीं अधिक महान था।
चन्द्रगुप्त मौर्य की दास्तान यह सिखाती है कि यदि एक योग्य गुरु (चाणक्य) और एक संकल्पवान शिष्य (चन्द्रगुप्त) मिल जाएं, तो वे साधारण संसाधनों से भी इतिहास की धारा को मोड़ सकते हैं और एक अखंड राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। वे भारत के प्रथम राष्ट्रीय सम्राट (First National Monarch of India) थे, जिनकी वीरगाथा हमेशा अजर-अमर रहेगी।