सम्राट अशोक महान

सम्राट अशोक महान वह ध्रुव तारा हैं जिसकी रोशनी न केवल भारत, बल्कि पूरे एशिया और विश्व के बड़े हिस्से तक पहुँची।

सम्राट अशोक महान

मुख्य तथ्य:

सम्राट अशोक महान: विश्व इतिहास के सबसे महान शासक की विस्तृत और प्रामाणिक गाथा

भारतीय इतिहास के आकाश में यदि चन्द्रगुप्त मौर्य एक चमकते हुए सूर्य हैं, तो उनके पौत्र सम्राट अशोक (Ashoka the Great) वह ध्रुव तारा हैं जिसकी रोशनी न केवल भारत, बल्कि पूरे एशिया और विश्व के बड़े हिस्से तक पहुँची। अशोक प्राचीन भारत के मौर्य राजवंश के तीसरे और सबसे प्रतापी सम्राट थे। उनका साम्राज्य पश्चिम में हिंदूकुश की पहाड़ियों (अफगानिस्तान) से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक, और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में मैसूर (कर्नाटक) तक फैला हुआ था।

अशोक का जीवन दो बिल्कुल विपरीत ध्रुवों की कहानी है। एक तरफ वह एक अत्यंत क्रूर, महत्वाकांक्षी और खूनी योद्धा 'चंडाशोक' (Chandashoka) थे, और दूसरी तरफ कलिंग युद्ध के बाद वे शांति, करुणा और अहिंसा के सबसे बड़े दूत 'धर्माशोक' (Dharmashoka) बन गए। ब्रिटिश इतिहासकार एच.जी. वेल्स (H.G. Wells) ने उनके बारे में लिखा है: "इतिहास के पन्नों को भरने वाले हज़ारों राजाओं, सम्राटों और महाराजाओं के बीच, अशोक का नाम एक अकेले तारे की तरह चमकता है।"

आइए, चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जन्म, संघर्ष, कलिंग के रक्तरंजित युद्ध, उनके हृदय परिवर्तन, धम्म (Dhamma), प्रशासनिक व्यवस्था और उनकी अमर विरासत का विस्तार से अध्ययन करते हैं।


1. प्रारंभिक जीवन, जन्म और माता-पिता

अशोक का जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) में हुआ था।

'अशोक' नामकरण:
कथाओं के अनुसार, महल की अन्य रानियों को सुभद्रांगी से ईर्ष्या थी और वे उसे राजा बिन्दुसार से दूर रखती थीं। जब एक दासी की मदद से सुभद्रांगी राजा के पास पहुँची और उसने एक पुत्र को जन्म दिया, तो उसने खुशी से कहा, "अब मैं शोकरहित (बिना दुःख के) हो गई हूँ।" इसी कारण उस बालक का नाम 'अशोक' (A-shoka: जिसे कोई शोक न हो) रखा गया।

बचपन और शारीरिक बनावट:
अशोक अपने पिता बिन्दुसार के सबसे प्रिय पुत्र नहीं थे। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, अशोक की त्वचा थोड़ी खुरदरी (Rough skin) थी और वे देखने में बहुत आकर्षक नहीं थे। राजा बिन्दुसार अपने बड़े बेटे सुसीम को सबसे अधिक मानते थे। लेकिन जो कमी अशोक के रूप-रंग में थी, वह उनके अदम्य साहस, तीक्ष्ण बुद्धि और युद्ध कौशल ने पूरी कर दी थी। बचपन से ही अशोक अत्यंत निडर और युद्ध कला में पारंगत थे। कहा जाता है कि युवावस्था में उन्होंने एक शेर को लकड़ी के एक साधारण डंडे से मार गिराया था।


2. युवावस्था, शिक्षा और तक्षशिला का विद्रोह

अशोक की शिक्षा-दीक्षा पाटलिपुत्र के शाही दरबार में हुई। उन्हें कूटनीति, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और सैन्य संचालन का गहन प्रशिक्षण दिया गया।

उज्जैन के गवर्नर (प्रशासक):
अशोक की प्रशासनिक और सैन्य क्षमताओं को देखते हुए, सम्राट बिन्दुसार ने उन्हें अवंति (मालवा) प्रांत का गवर्नर बनाकर उज्जैन (Ujjain) भेज दिया। उज्जैन में अशोक ने एक अत्यंत कुशल प्रशासक के रूप में अपनी पहचान बनाई। यहीं उनकी मुलाकात विदिशा की एक व्यापारी की पुत्री महादेवी (देवी) से हुई, जिनसे उन्होंने विवाह किया। महादेवी से ही उनके प्रसिद्ध पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ, जिन्होंने बाद में श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।

तक्षशिला के विद्रोह का दमन:
बिन्दुसार के शासनकाल में उत्तर-पश्चिमी प्रांत तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान) में अमात्यों (अधिकारियों) के अत्याचारों के खिलाफ भयंकर विद्रोह हुआ। इस विद्रोह को दबाने के लिए बिन्दुसार ने अपने बड़े बेटे सुसीम को भेजा, लेकिन सुसीम पूरी तरह विफल रहा।
तब राजा ने अशोक को तक्षशिला भेजा। अशोक की ख्याति और कूटनीति इतनी प्रभावशाली थी कि उनके तक्षशिला पहुँचते ही बिना कोई युद्ध लड़े, विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। तक्षशिला के नागरिकों ने कहा कि उनका विरोध सम्राट से नहीं, बल्कि भ्रष्ट मंत्रियों से है। इस सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि मौर्य साम्राज्य का सबसे योग्य उत्तराधिकारी अशोक ही है।


3. सत्ता का खूनी संघर्ष और राज्याभिषेक (चंडाशोक का काल)

लगभग 273 ईसा पूर्व में सम्राट बिन्दुसार गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उनकी इच्छा थी कि बड़ा बेटा सुसीम राजा बने, लेकिन सुसीम उस समय तक्षशिला में एक और विद्रोह को दबाने में लगा था (या उसे जानबूझकर वहां उलझाए रखा गया था)।

राधागुप्त की भूमिका:
बिन्दुसार के दरबार के प्रमुख मंत्री राधागुप्त (जो आचार्य चाणक्य के शिष्य माने जाते हैं) और अन्य अमात्यों का मानना था कि सुसीम एक क्रूर और अयोग्य शासक साबित होगा। उन्होंने गुप्त रूप से अशोक को उज्जैन से पाटलिपुत्र बुला लिया।

99 भाइयों के वध की कथा:
बौद्ध ग्रंथों (विशेषकर सिंहली अनुश्रुतियों 'दीपवंश' और 'महावंश') के अनुसार, सत्ता प्राप्त करने के लिए अशोक ने एक अत्यंत खूनी गृहयुद्ध लड़ा। ऐसा कहा जाता है कि अशोक ने अपने सगे भाई 'तिष्य' (Tissa) को छोड़कर अपने 99 सौतेले भाइयों की हत्या कर दी और उनके शवों को पाटलिपुत्र के एक कुएँ में फेंक दिया, जिसे बाद में 'अगम कुआँ' कहा गया। इसी क्रूरता के कारण उन्हें 'चंडाशोक' (क्रूर अशोक) कहा जाने लगा।
(हालांकि, आधुनिक इतिहासकार 99 भाइयों की हत्या को बौद्ध ग्रंथों की अतिशयोक्ति मानते हैं, ताकि बाद में बौद्ध धर्म अपनाने पर अशोक के हृदय परिवर्तन को और अधिक चमत्कारी दिखाया जा सके। लेकिन यह सच है कि अशोक को सत्ता पाने के लिए भीषण रक्तपात करना पड़ा था।)

राज्याभिषेक में देरी:
सत्ता संघर्ष के कारण, अशोक 273 ईसा पूर्व में सत्ता पर काबिज तो हो गए, लेकिन उनका औपचारिक राज्याभिषेक 4 साल बाद 269 ईसा पूर्व में हुआ। राज्याभिषेक के बाद उन्होंने 'देवानांप्रिय' (देवताओं का प्रिय) और 'प्रियदर्शी' (देखने में प्रिय) जैसी उपाधियाँ धारण कीं।


4. कलिंग का महायुद्ध: इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ (261 ईसा पूर्व)

अशोक के राज्याभिषेक के 8वें वर्ष (लगभग 261 ईसा पूर्व) में वह युद्ध हुआ जिसने न केवल अशोक का, बल्कि पूरे विश्व का इतिहास बदल कर रख दिया—कलिंग का युद्ध (The Kalinga War)

कलिंग युद्ध के कारण:
कलिंग (वर्तमान ओडिशा राज्य और उत्तरी आंध्र प्रदेश का क्षेत्र) मौर्य साम्राज्य का हिस्सा नहीं था। चन्द्रगुप्त मौर्य ने इसे जीतने की कोशिश की थी, लेकिन वे सफल नहीं हुए थे। कलिंग एक शक्तिशाली और समृद्ध राज्य था, जिसकी नौसेना बहुत मजबूत थी। दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापारिक समुद्री मार्गों पर कलिंग का नियंत्रण था। अशोक अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा और व्यापारिक मार्गों पर पूर्ण अधिकार पाने के लिए कलिंग को किसी भी कीमत पर जीतना चाहते थे।

युद्ध की भयानकता:
कलिंग की प्रजा अत्यंत स्वाभिमानी थी। उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय मौर्यों की विशाल सेना से लड़ने का फैसला किया। कलिंग का युद्ध दया नदी (Daya River) के किनारे लड़ा गया। यह इतिहास के सबसे भीषण और रक्तरंजित युद्धों में से एक था।
अशोक के 13वें प्रमुख शिलालेख (13th Major Rock Edict) में इस युद्ध का हृदय विदारक वर्णन मिलता है। अशोक स्वयं लिखते हैं:

"मेरे राज्याभिषेक के 8वें वर्ष मैंने कलिंग पर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में लगभग एक लाख पचास हजार (1,50,000) लोगों को बंदी बनाकर निर्वासित कर दिया गया। एक लाख (1,00,000) से अधिक लोग युद्ध भूमि में मारे गए और इससे भी कई गुना अधिक लोग युद्ध के बाद महामारी और भुखमरी से नष्ट हो गए।"

कहा जाता है कि लाखों लोगों के खून से दया नदी का पानी पूरी तरह लाल हो गया था। युद्ध के बाद जब अशोक ने युद्धभूमि का दौरा किया, तो कटे हुए अंगों, रोती हुई महिलाओं, अनाथ बच्चों और लाशों के अंबार को देखकर उनकी आत्मा कांप उठी। विजय का वह क्षण उनके लिए सबसे बड़ी हार बन गया।


5. हृदय परिवर्तन और बौद्ध धर्म की दीक्षा

कलिंग के भीषण नरसंहार ने अशोक के मस्तिष्क में गहरा आघात किया। उन्हें यह महसूस हुआ कि यह विजय नहीं, बल्कि मानवता की हार है।

भेरीघोष से धम्मघोष की ओर:
अशोक ने हमेशा के लिए युद्ध और शस्त्र त्यागने की प्रतिज्ञा की। उन्होंने घोषणा की कि अब मौर्य साम्राज्य का विस्तार युद्ध के नगाड़ों (भेरीघोष) से नहीं, बल्कि धर्म और शांति के संदेशों (धम्मघोष) से होगा। उन्होंने दिग्विजय (सैन्य विजय) के स्थान पर 'धम्म विजय' (आध्यात्मिक विजय) की नीति अपनाई। एक क्रूर विजेता अब मानवता का सबसे बड़ा रक्षक बन गया था।


6. अशोक का 'धम्म' (Ashoka's Dhamma)

अशोक ने जिस 'धम्म' का प्रचार किया, वह केवल बौद्ध धर्म का प्रचार नहीं था। अशोक का धम्म एक व्यापक नैतिक आचार संहिता (Moral Code of Conduct) थी, जो सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों का निचोड़ थी। यह एक कल्याणकारी राज्य के निर्माण और नागरिकों के नैतिक उत्थान का माध्यम था।

अशोक के धम्म के प्रमुख सिद्धांत (उनके स्तंभ लेखों के अनुसार):

अशोक ने इस धम्म को लागू करने के लिए 'धम्म महामात्य' (Dhamma Mahamatras) नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की, जिनका काम यह देखना था कि साम्राज्य में न्याय हो रहा है या नहीं और धम्म का पालन हो रहा है या नहीं।


7. साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और लोककल्याण

अशोक का प्रशासन अपने दादा चन्द्रगुप्त मौर्य की मजबूत नींव पर आधारित था, लेकिन अशोक ने इसमें 'पितृसत्तात्मक लोककल्याण' (Paternalistic Welfare) का रंग भर दिया। अशोक का प्रसिद्ध वाक्य है:

"सवे मुनिसे पजा ममा" (सभी मनुष्य मेरी संतान हैं)।

प्रशासनिक विभाजन:
विशाल मौर्य साम्राज्य को 5 मुख्य प्रांतों में बांटा गया था:

  1. उत्तरापथ: राजधानी तक्षशिला
  2. अवंतिरट्ठ: राजधानी उज्जयिनी
  3. कलिंग: राजधानी तोसली (नया प्रांत)
  4. दक्षिणापथ: राजधानी सुवर्णगिरि
  5. प्राची (मध्य प्रांत): राजधानी पाटलिपुत्र

लोककल्याणकारी कार्य:
अशोक इतिहास के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने मनुष्यों के साथ-साथ जानवरों के लिए भी अस्पताल (चिकित्सालय) खुलवाए।

अशोक ने अपने अधिकारियों (रज्जुक, युक्त और प्रादेशिक) को आदेश दिया था कि वे हर 5 साल में साम्राज्य का दौरा करें और जनता की समस्याओं को सुलझाएं। अशोक स्वयं हमेशा जनता के लिए उपलब्ध रहते थे। उन्होंने शिलालेखों में लिखवाया: "चाहे मैं भोजन कर रहा हूँ, या शयन कक्ष में हूँ, या अपने बगीचे में हूँ, मेरे प्रतिवेदक (संदेशवाहक) मुझे हर समय जनता की समस्याओं से अवगत कराएं।"


8. अशोक के शिलालेख, स्तंभलेख और गुहा लेख (Edicts of Ashoka)

सम्राट अशोक प्राचीन भारत के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने अपनी प्रजा से सीधे बात करने के लिए पत्थरों (चट्टानों और स्तंभों) का सहारा लिया। यह प्रेरणा उन्हें संभवतः ईरानी सम्राट डेरियस (Darius) से मिली थी।

भाषा और लिपि:
अशोक के अभिलेख साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में वहाँ की स्थानीय भाषाओं और लिपियों में लिखवाए गए ताकि आम जनता उन्हें पढ़ सके:

इन लिपियों को पढ़ने का श्रेय सबसे पहले 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) को जाता है, जिन्होंने ब्राह्मी लिपि को डीकोड किया।

प्रमुख शिलालेख (Major Rock Edicts): 14 प्रमुख शिलालेख हैं, जो साम्राज्य की सीमाओं पर चट्टानों पर उकेरे गए हैं।

स्तंभ लेख (Pillar Edicts): 7 मुख्य स्तंभ लेख हैं। ये बलुआ पत्थर (Sandstone) के बने एकाश्म (Monolithic) स्तंभ हैं, जिनकी पॉलिश आज हजारों साल बाद भी शीशे की तरह चमकती है।


9. वास्तुकला और बौद्ध धर्म का विश्वव्यापी प्रचार

अशोक एक महान निर्माता भी थे। बौद्ध परंपरा के अनुसार, अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को निकालकर पूरे साम्राज्य में 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया था।

तृतीय बौद्ध संगीति (Third Buddhist Council):
बौद्ध धर्म में आ रहे मतभेदों को दूर करने के लिए अशोक ने लगभग 250 ईसा पूर्व में अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता 'मोग्गलिपुत्त तिस्स' ने की। इसमें 'अभिधम्म पिटक' का संकलन हुआ।

धम्म प्रचारक (Missionaries):
इस संगीति के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को विश्व धर्म बनाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने विभिन्न देशों में धम्म प्रचारक भेजे:

अशोक के इन्ही प्रयासों के कारण बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर पूरे एशिया (चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया) का प्रमुख धर्म बन गया।


10. पारिवारिक जीवन और पत्नियाँ

सम्राट अशोक का पारिवारिक जीवन अत्यंत विस्तृत और कुछ हद तक जटिल था। उनके अभिलेखों और ऐतिहासिक साक्ष्यों में उनकी कई पत्नियों का उल्लेख मिलता है:


11. जीवन के अंतिम दिन और मौर्य साम्राज्य का पतन

एक ऐसा सम्राट जिसने आधी दुनिया को हिलाकर रख दिया था, उसके अंतिम दिन अत्यंत दुखद और असहाय अवस्था में बीते।

सत्ता का क्षीण होना:
बौद्ध ग्रंथों (दिव्यावदान) के अनुसार, जीवन के अंतिम वर्षों में अशोक ने राज्य का खजाना बौद्ध संघों और भिक्षुओं को दान करना शुरू कर दिया। उनके इस अत्यधिक दान से राज्य की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। इसे रोकने के लिए अशोक के मंत्रियों (विशेषकर अमात्य राधागुप्त) और उनके पौत्र संप्रति ने राजा के आदेशों को मानना बंद कर दिया और राजकोष पर प्रतिबंध लगा दिया।

आधा आंवला और मृत्यु:
कहा जाता है कि अपने अंतिम दिनों में चक्रवर्ती सम्राट अशोक के पास दान देने के लिए केवल 'आधा आंवला' बचा था। एक समय जिस राजा की उंगली उठने पर लाखों की सेना कूच कर जाती थी, वह अंत में एक बंदी की तरह जीवन व्यतीत करने लगा। लगभग 40 वर्षों तक सफलतापूर्वक शासन करने के बाद, 232 ईसा पूर्व में 72 वर्ष की आयु में सम्राट अशोक ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

साम्राज्य का पतन:
अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य तेजी से पतन की ओर अग्रसर हुआ। उनके उत्तराधिकारी (जैसे कुणाल, दशरथ, संप्रति) अत्यंत कमजोर और अयोग्य निकले। साम्राज्य पश्चिमी और पूर्वी भागों में बंट गया। विदेशी आक्रमणकारियों (बैक्ट्रियन ग्रीक) ने फिर से हमले शुरू कर दिए। अशोक की अहिंसा की नीति ने शायद मौर्य सेना को युद्ध अभ्यास से दूर कर दिया था। अंततः 185 ईसा पूर्व में, अंतिम मौर्य सम्राट 'बृहद्रथ' की उसके ही ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने हत्या कर दी और एक महान मौर्य साम्राज्य का अंत हो गया।


12. आधुनिक भारत में सम्राट अशोक की अमर विरासत

भले ही मौर्य साम्राज्य मिट्टी में मिल गया हो, लेकिन सम्राट अशोक आज भी आधुनिक भारत की आत्मा में जीवित हैं। जब भारत 1947 में आज़ाद हुआ, तो स्वतंत्र भारत ने अपनी पहचान के लिए जिस व्यक्ति की ओर देखा, वह कोई और नहीं बल्कि सम्राट अशोक ही थे।


निष्कर्ष

इतिहास में कई ऐसे राजा हुए जिन्होंने तलवार के बल पर बड़े-बड़े साम्राज्य खड़े किए—सिकंदर, चंगेज़ खान, नेपोलियन। लेकिन इन सबका साम्राज्य इनकी मृत्यु के कुछ ही वर्षों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया। सम्राट अशोक महान इसलिए नहीं हैं कि उन्होंने एक विशाल साम्राज्य जीता, बल्कि वे इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने यह सिखाया कि सच्ची विजय तलवार से नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और धर्म से प्राप्त की जाती है।

उन्होंने अपनी सत्ता का उपयोग जनता पर अत्याचार करने के लिए नहीं, बल्कि मानव जाति को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से ऊपर उठाने के लिए किया। वे विश्व के पहले और एकमात्र ऐसे सम्राट हैं जिन्होंने युद्ध में स्पष्ट जीत हासिल करने के बाद शस्त्र त्याग दिए। जब तक इस पृथ्वी पर सत्य, अहिंसा और शांति का महत्व रहेगा, सम्राट अशोक महान (Ashoka the Great) का नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दमकता रहेगा।

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