समय के साथ आचार्य चाणक्य वृद्ध होने लगे, किन्तु उनकी बुद्धि, दूरदर्शिता और प्रभाव में कोई कमी नहीं आई।
प्रस्तावना : पिछले भाग में आपने आचार्य चाणक्य के जीवन दर्शन, शिक्षा, परिवार, मित्रता, चरित्र, धन, समाज और जीवन प्रबंधन से जुड़ी नीतियों का अध्ययन किया। अब इस अष्टम भाग में वर्णन होगा आचार्य चाणक्य के जीवन के अंतिम वर्षों, उनके विरुद्ध रचे गए षड्यंत्रों, उनकी मृत्यु की कथा, और उनके द्वारा छोड़ी गई अमर विरासत का।
समय के साथ आचार्य चाणक्य वृद्ध होने लगे, किन्तु उनकी बुद्धि, दूरदर्शिता और प्रभाव में कोई कमी नहीं आई। वे अब भी राज्य के सबसे महत्वपूर्ण सलाहकार थे और प्रत्येक बड़े निर्णय में उनका मत लिया जाता था।
चन्द्रगुप्त मौर्य उनके प्रति पूर्ववत श्रद्धावान थे और उन्हें अपने पिता के समान मानते थे।
किन्तु जैसे-जैसे समय बीता, दरबार में नए लोग आए, नई पीढ़ी आई, और चाणक्य के विरोधियों की संख्या भी बढ़ने लगी।
दरबार के अनेक लोग चाणक्य की शक्ति और प्रभाव से ईर्ष्या करते थे। वे सोचते थे कि जब तक चाणक्य जीवित हैं, राज्य में किसी अन्य का महत्व नहीं बढ़ सकता।
कुछ मंत्री और दरबारी धीरे-धीरे उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।
वे कहते थे :
“जब किसी व्यक्ति की महानता बढ़ती है, उसके शत्रु भी बढ़ते हैं।”
समय आने पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने राज्य त्याग दिया और उनके पुत्र बिन्दुसार ने शासन संभाला। आचार्य चाणक्य ने बिन्दुसार को भी मार्गदर्शन देना प्रारम्भ किया।
वे चाहते थे कि मौर्य साम्राज्य उतना ही सशक्त बना रहे जितना चन्द्रगुप्त के समय था।
बिन्दुसार भी चाणक्य का सम्मान करते थे, किन्तु उनका संबंध चन्द्रगुप्त जितना गहरा नहीं था।
बिन्दुसार के दरबार में कुछ ऐसे मंत्री थे जो चाणक्य से ईर्ष्या रखते थे और बिन्दुसार के मन में उनके प्रति संदेह उत्पन्न करना चाहते थे।
लोककथाओं के अनुसार बिन्दुसार के दरबार में एक मंत्री था जिसका नाम सुबंधु था। वह चाणक्य से अत्यन्त ईर्ष्या करता था और उन्हें दरबार से हटाना चाहता था।
उसने बिन्दुसार के मन में यह भ्रम उत्पन्न किया कि चाणक्य ने उनकी माता की मृत्यु में भूमिका निभाई थी।
एक प्रचलित कथा के अनुसार चाणक्य चन्द्रगुप्त को प्रतिदिन थोड़ी मात्रा में विष देते थे ताकि वह विष से सुरक्षित रह सके। एक दिन यह विष युक्त भोजन गलती से रानी ने खा लिया जब वह गर्भवती थीं।
रानी की मृत्यु हो गई, किन्तु गर्भस्थ शिशु को बचा लिया गया—वही आगे चलकर बिन्दुसार बने।
कहा जाता है कि बिन्दुसार को यह बात बाद में गलत रूप में बताई गई और उन्हें चाणक्य पर संदेह हुआ।
यह कथा परम्पराओं में मिलती है, यद्यपि ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं।
जब चाणक्य ने देखा कि राजा के मन में उनके प्रति संदेह उत्पन्न हो गया है, तो उन्होंने राज्यकार्य से स्वयं को अलग कर लिया।
वे किसी पद या शक्ति से चिपके रहने वाले व्यक्ति नहीं थे।
वे कहते थे :
“सम्मान चला जाए तो पद का कोई मूल्य नहीं।”
चाणक्य ने राजमहल छोड़ दिया और एक शांत स्थान पर जाकर तपस्या एवं ध्यान में समय बिताने लगे। वे अब संसारिक विषयों से दूर रहकर आत्मचिन्तन करने लगे।
किन्तु उनके शत्रु अभी भी उनसे भयभीत थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि जब तक चाणक्य जीवित हैं, उनका प्रभाव बना रहेगा।
लोककथाओं के अनुसार सुबंधु ने षड्यंत्र रचकर चाणक्य की कुटिया में आग लगवा दी, जब वे ध्यानमग्न थे।
कुछ कथाओं में कहा गया है कि चाणक्य ने स्वयं अग्नि समाधि ली।
कुछ अन्य कथाओं में कहा गया है कि उन्होंने उपवास द्वारा देह त्यागी।
उनकी मृत्यु का सटीक ऐतिहासिक विवरण स्पष्ट नहीं है, किन्तु यह माना जाता है कि उन्होंने अत्यन्त सम्मान और वैराग्य के साथ जीवन का अंत किया।
कथा है कि मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपने शिष्यों से कहा :
“धन नष्ट होगा, शरीर नष्ट होगा, साम्राज्य बदलेंगे, पर ज्ञान और नीति अमर रहेंगे।”
आचार्य चाणक्य की सबसे बड़ी विरासत थी :
• मौर्य साम्राज्य की स्थापना
• अखण्ड भारत की अवधारणा
• अर्थशास्त्र
• चाणक्य नीति
• शासन विज्ञान
• कूटनीति और गुप्तचर व्यवस्था
आज भी चाणक्य की नीतियाँ निम्न क्षेत्रों में पढ़ाई जाती हैं :
• राजनीति
• प्रबंधन
• प्रशासन
• नेतृत्व प्रशिक्षण
• सैन्य रणनीति
• व्यवसाय प्रबंधन
विश्व के अनेक विद्वान चाणक्य को प्राचीन विश्व के सबसे महान राजनीतिक विचारकों में गिनते हैं। उन्हें कई लोग भारत का “मैकियावेली” कहते हैं, किन्तु भारतीय दृष्टि में वे उससे कहीं अधिक महान माने जाते हैं।
चाणक्य का एक प्रसिद्ध विचार :
“जब तक तुम्हारा शरीर स्वस्थ और नियंत्रण में है, आत्मा को बचा लो; मृत्यु आने पर कुछ नहीं किया जा सकता।”
1. महान व्यक्ति मरकर भी जीवित रहते हैं।
2. ज्ञान अमर है।
3. नीति समय से परे होती है।
4. शक्ति और सम्मान साथ चलें तो राज्य स्थिर रहता है।
5. शंका सम्बन्ध नष्ट कर देती है।
6. षड्यंत्र से सावधान रहो।
7. बुद्धि का प्रयोग जीवन भर करो।
8. सफलता के बाद भी सावधान रहो।
9. पद स्थायी नहीं, चरित्र स्थायी है।
10. मृत्यु अंत नहीं, कर्मों की शुरुआत है।
आचार्य चाणक्य केवल एक व्यक्ति नहीं थे; वे एक विचारधारा थे। वे केवल शिक्षक नहीं थे; वे राष्ट्रनिर्माता थे। वे केवल मंत्री नहीं थे; वे इतिहास निर्माता थे।
उन्होंने सिद्ध किया कि बुद्धि, धैर्य, नीति और संकल्प के बल पर कोई भी असम्भव कार्य सम्भव किया जा सकता है।
उनका जीवन हमें सिखाता है कि महानता केवल बल से नहीं, बल्कि बुद्धि, अनुशासन, संयम और दूरदर्शिता से प्राप्त होती है।
यह था चाणक्य महाग्रंथ का अष्टम भाग जिसमें आपने उनके अंतिम जीवन, मृत्यु और अमर विरासत के विषय में पढ़ा।