आचार्य चाणक्य भाग 5

चाणक्य का नाम आज भी राजनीति, प्रबंधन, कूटनीति और नेतृत्व का पर्याय माना जाता है।

आचार्य चाणक्य

इसमें पढ़े:

आचार्य चाणक्य का महाग्रंथ – भाग 5

प्रस्तावना

प्रस्तावना : पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार आचार्य चाणक्य ने मौर्य साम्राज्य का विस्तार कराया, विदेशी शक्तियों को परास्त किया, अर्थशास्त्र की रचना की तथा राज्य संचालन के महान सिद्धान्त स्थापित किए। अब इस पंचम भाग में वर्णन होगा उनके व्यक्तिगत जीवन, तपस्या, सादगी, दैनिक जीवनचर्या, शत्रुओं के षड्यंत्र, दरबारी विरोध और उनकी प्रसिद्ध प्रेरणादायक कथाओं का।

चाणक्य का व्यक्तिगत जीवन

यद्यपि चाणक्य सम्पूर्ण भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक थे, फिर भी उनका जीवन अत्यन्त साधारण था। वे राजमहल में रहने के स्थान पर एक साधारण कुटिया में रहना पसन्द करते थे। उनके वस्त्र सादे थे, भोजन सामान्य था और जीवन तपस्वी के समान था।

वे मानते थे :

“जो व्यक्ति स्वयं सुखों का दास बन जाता है, वह राज्य का संचालन नहीं कर सकता।”

सादगी का जीवन

आचार्य चाणक्य के पास राज्य की अपार शक्ति थी। वे चाहें तो स्वर्ण महलों में रह सकते थे, दास-दासियों से सेवा ले सकते थे, विलासिता का जीवन जी सकते थे; किन्तु उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया।

वे मिट्टी अथवा लकड़ी की कुटिया में रहते थे, भूमि पर बैठते थे और साधारण पात्रों में भोजन करते थे।

उनका विश्वास था :

“जिसका मन भोग में लग जाए, उसकी बुद्धि नीति से हट जाती है।”

चाणक्य की दिनचर्या

कहा जाता है कि चाणक्य का जीवन अत्यन्त अनुशासित था। उनकी दैनिक दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी :

• ब्रह्ममुहूर्त में जागना

• स्नान और ध्यान करना

• शास्त्र अध्ययन करना

• राज्य के समाचार सुनना

• मंत्रियों से चर्चा करना

• प्रशासनिक निर्णय लेना

• विद्यार्थियों को शिक्षा देना

• रात्रि में रणनीति और योजनाओं पर विचार करना

वे समय का अत्यन्त सम्मान करते थे और कहते थे :

“समय सबसे बलवान है; इसका अपमान करने वाला स्वयं नष्ट होता है।”

राजकोष के उपयोग में ईमानदारी

एक बार कुछ विदेशी दूत रात्रि में चाणक्य से मिलने आए। उस समय वे राज्य कार्य कर रहे थे और एक दीपक जल रहा था। जैसे ही राजकार्य समाप्त हुआ, उन्होंने वह दीपक बुझा दिया और दूसरा दीपक जला लिया।

दूतों ने आश्चर्य से पूछा :

“आचार्य, आपने ऐसा क्यों किया?”

चाणक्य ने उत्तर दिया :

“पहला दीपक राज्य के धन से जल रहा था क्योंकि मैं राजकार्य कर रहा था। अब मैं निजी वार्ता कर रहा हूँ, इसलिए निजी दीपक जलाया है।”

यह उनकी ईमानदारी और राजधन के प्रति निष्ठा का महान उदाहरण है।

भोजन और संयम

चाणक्य अत्यन्त संयमित जीवन जीते थे। वे केवल उतना ही भोजन करते थे जितना शरीर के लिए आवश्यक हो। वे अधिक भोजन, अधिक निद्रा और अधिक विलासिता को बुद्धि का शत्रु मानते थे।

वे कहते थे :

“जो अपनी इन्द्रियों को नहीं जीत सकता, वह संसार नहीं जीत सकता।”

दरबार में विरोधी

चाणक्य की शक्ति और प्रभाव इतना अधिक था कि अनेक दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे। कुछ लोग उन्हें अत्यधिक कठोर मानते थे, कुछ उनके प्रभाव से भयभीत रहते थे।

अनेक दरबारी चाहते थे कि किसी प्रकार चाणक्य का प्रभाव समाप्त हो जाए।

षड्यंत्रों का सामना

चाणक्य के विरुद्ध अनेक बार षड्यंत्र रचे गए। कुछ शत्रुओं ने उन्हें बदनाम करने का प्रयास किया, कुछ ने उनके विरुद्ध झूठ फैलाए, कुछ ने उनके निर्णयों का विरोध किया।

किन्तु चाणक्य प्रत्येक षड्यंत्र को अपनी बुद्धि से विफल कर देते थे।

वे कहते थे :

“जो व्यक्ति स्वयं जागरूक हो, उसे छलना कठिन है।”

विष परीक्षण की नीति

कहा जाता है कि चाणक्य हर भोजन और पेय की जाँच करवाते थे क्योंकि उन्हें सदैव विष दिए जाने की आशंका रहती थी। वे अपने शिष्यों और राजा को भी सावधान रहने को कहते थे।

उनका मानना था :

“राजा का जीवन केवल उसका नहीं, पूरे राज्य का होता है; उसकी रक्षा सर्वोपरि है।”

चन्द्रगुप्त के प्रति उनका स्नेह

यद्यपि चाणक्य अत्यन्त कठोर थे, किन्तु चन्द्रगुप्त के प्रति उनके हृदय में गहरा स्नेह था। वे उसे केवल शिष्य नहीं, अपने पुत्र के समान मानते थे।

वे उसके भविष्य, सुरक्षा और चरित्र को लेकर सदैव चिन्तित रहते थे।

एक कथा – फटे वस्त्रों वाला महामंत्री

एक बार एक विदेशी यात्री ने चाणक्य को साधारण फटे वस्त्रों में देखा और पूछा :

“आप इतने बड़े साम्राज्य के महामंत्री होकर भी इतने साधारण वस्त्र क्यों पहनते हैं?”

चाणक्य मुस्कराए और बोले :

“यदि मंत्री रेशम पहने और जनता भूखी रहे, तो वह राज्य शीघ्र नष्ट हो जाता है।”

यह उत्तर सुनकर वह व्यक्ति नतमस्तक हो गया।

चाणक्य का क्रोध

चाणक्य अत्यन्त धैर्यवान थे, किन्तु अन्याय, मूर्खता और विश्वासघात पर अत्यन्त क्रोधित हो जाते थे। उनका क्रोध विनाशकारी माना जाता था।

लोग कहते थे :

“चाणक्य का अपमान मत करो, क्योंकि उनका क्रोध साम्राज्य बदल सकता है।”

शिक्षण शैली

वे अपने विद्यार्थियों को केवल पुस्तक ज्ञान नहीं देते थे। वे उन्हें वास्तविक जीवन के उदाहरणों, कठिन परिस्थितियों और व्यवहारिक परीक्षाओं से सिखाते थे।

उनका विश्वास था :

“केवल पढ़ा हुआ ज्ञान अधूरा है; अनुभव से प्राप्त ज्ञान ही पूर्ण है।”

मित्र और शत्रु पर विचार

चाणक्य ने कहा :

“मित्रता में भी सावधानी रखो, क्योंकि अत्यधिक विश्वास विश्वासघात का कारण बन सकता है।”

और :

“शत्रु को कभी कमजोर मत समझो, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो।”

प्रेरणादायक कथा – सर्प और साधु

एक कथा के अनुसार एक शिष्य ने पूछा :

“क्या सदैव विनम्र रहना चाहिए?”

चाणक्य ने कहा :

“विनम्र रहो, पर इतना नहीं कि लोग तुम्हें कमजोर समझ लें।”

उन्होंने उदाहरण दिया :

“यदि सर्प विषैला न भी हो, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए।”

चाणक्य की प्रसिद्ध नीतियाँ – भाग 5

1. अत्यधिक प्रेम दुःख का कारण बनता है।

2. धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया, चरित्र गया तो सब गया।

3. मूर्ख व्यक्ति के साथ विवाद मत करो।

4. सफलता का मूल मंत्र है गोपनीयता।

5. जो स्वयं को अनुशासित नहीं कर सकता, वह कभी महान नहीं बन सकता।

6. आवश्यकता से अधिक बोलना हानि देता है।

7. अच्छे मित्र और अच्छे ग्रन्थ जीवन बदल देते हैं।

8. विपत्ति में धैर्य मत छोड़ो।

9. आत्मविश्वास विजय की पहली सीढ़ी है।

10. बुद्धिमान वही है जो परिस्थिति देखकर स्वयं को बदल ले।

चाणक्य का प्रभाव

धीरे-धीरे चाणक्य केवल एक मंत्री नहीं रहे, बल्कि पूरे भारत में नीति, बुद्धि और शक्ति का प्रतीक बन गए। राजा, सेनापति, मंत्री और विद्वान सभी उनका सम्मान करते थे।

भाग 5 का समापन

यह था चाणक्य महाग्रंथ का पंचम भाग जिसमें आपने उनके व्यक्तिगत जीवन, सादगी, अनुशासन, ईमानदारी, दरबारी षड्यंत्रों और प्रसिद्ध कथाओं के विषय में पढ़ा।

अगले भाग में : चाणक्य की गहन राजनीतिक चालें, गुप्त युद्ध, मानसिक युद्ध, शत्रुओं को पराजित करने की अद्भुत रणनीतियाँ, और उनके सबसे रहस्यमयी निर्णय।

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